चीन की मोनोपॉली पर जापान का बड़ा वार! समंदर की 6000 मीटर गहराई से निकालेगा ‘सोने से भी कीमती’ कीचड़

1 hour ago

Japan Deep Sea Rare Earth Mining: चीन लंबे समय से दुनिया में रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है. इसका असर कई देशों पर पड़ता रहा है खासकर जापान जैसे देशों पर. बता दें, अब जापान ने इस दादागिरी को खत्म करने के लिए खुद के संसाधनों पर भरोसा करने का फैसला किया है.

चीन की पकड़ तोड़ने की तैयारी
जापान ने तय किया है कि वह 2027 तक गहरे समुद्र से रेयर अर्थ मिनरल्स निकालने और उन्हें रिफाइन करने की पूरी व्यवस्था तैयार कर लेगा. निक्केई एशिया की रिपोर्ट के मुताबिक जापान समुद्र की सतह से करीब 6000 मीटर नीचे तक जाकर समुद्र तल की मिट्टी कीचड़ निकालेगा. इसी कीचड़ में डिस्प्रोसियम जैसे कीमती रेयर अर्थ एलिमेंट पाए जाते हैं. जिनका इस्तेमाल खासतौर पर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में होता है.

जापान के लिए क्यों जरूरी हैं रेयर अर्थ?
जापान दुनिया की बड़ी ऑटोमोबाइल ताकतों में से एक है. टोयोटा, होंडा, सुजुकी और निसान जैसी कंपनियां पूरी दुनिया में जानी जाती हैं. साल 2010 में सेनकाकू द्वीपों को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद हुआ था. उस वक्त चीन ने जापान को रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई रोक दी थी जिससे जापान की इंडस्ट्रीज को भारी नुकसान झेलना पड़ा था. इसी घटना के बाद जापान ने तय कर लिया था कि उसे चीन पर अपनी निर्भरता कम करनी ही होगी.

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चीन पर निर्भरता घटी
चीन अभी दुनिया की करीब 70 फीसदी रेयर अर्थ सप्लाई को कंट्रोल करता है. रिफाइनिंग में यह आंकड़ा करीब 90 फीसदी तक पहुंच जाता है. 2010 के बाद जापान ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी लिनास में हिस्सेदारी खरीदी जिससे उसे लंबे समय के लिए रेयर अर्थ की सप्लाई मिली. इससे जापान चीन पर अपनी निर्भरता करीब एक तिहाई तक कम करने में सफल रहा था.

समुद्र से निकलेगा कीमती कीचड़
अब जापान अपने समुद्री इलाके में मौजूद संसाधनों पर काम कर रहा है. योजना के तहत दूर स्थित मिनमिटोरिशिमा द्वीप पर एक खास फैसिलिटी बनाई जाएगी. यहां समुद्र तल से निकाले गए कीचड़ को लाया जाएगा. पानी अलग किया जाएगा. इसके बाद बची मिट्टी को जहाज के जरिए जापान की मुख्य भूमि पर भेजा जाएगा जहां इसकी रिफाइनिंग होगी.

बता दें, रिपोर्ट के मुताबिक यह टेस्ट माइनिंग जनवरी और फरवरी 2026 में शुरू हो सकती है. इसके लिए जापान एजेंसी फॉर मरीन-अर्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की रिसर्च शिप का इस्तेमाल होगा. इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए जापान ने करीब 105 मिलियन डॉलर का बजट तय किया है.

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