Last Updated:January 12, 2026, 21:28 IST
चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र की 'लाडकी बहीण योजना' में एडवांस पेमेंट करने पर रोक लगा दी है. यह बीएमसी चुनाव से पहले फडणवीस सरकार के लिए झटका है. लेकिन सवाल उठ रहे कि जब यहां रोका गया तो बिहार में जब नीतीश सरकार चुनाव के बीच पैसे बांट रही थी, तब क्यों नहीं रोका गया? इसका जवाब जानने की कोशिश करते हैं.
सीआईसी ज्ञानेश कुमारमहाराष्ट्र में बीमएसी चुनाव की पूर्व संध्या पर चुनाव आयोग ने ‘लाडकी बहीण योजना’ की जनवरी महीने की किश्त को समय से पहले जारी करने पर रोक लगा दी है. इसे देवेंद्र फडणवीस सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. लेकिन चुनाव आयोग के इस फैसले ने सवाल भी खड़े कर दिए हैं. विपक्ष के नेता पूछ रहे कि जब बिहार चुनाव के दौरान महिलाओं के खातों में खटाखट पैसे आ रहे थे, तब आयोग खामोश क्यों था? आखिर एक ही देश में दो राज्यों के लिए अलग-अलग नियम क्यों? हालांकि, अगर चुनाव आयोग के नियमों और दोनों मामलों को बारीकी से देखें, तो बिहार और महाराष्ट्र की स्थिति में थोड़ा अंतर है.
महाराष्ट्र सरकार मकर संक्रांति के मौके पर महिलाओं को खुश करना चाहती थी. सरकार की योजना थी कि जनवरी महीने का पैसा, जनवरी खत्म होने का इंतजार किए बिना, 14 तारीख से पहले ही ‘एडवांस’ में दे दिया जाए. सरकार ने इसे ‘संक्रांति की भेंट’ के तौर पर प्रचारित किया था. यहीं पर चुनाव आयोग ने आपत्ति जताई. राज्य चुनाव आयोग ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि चूंकि आदर्श आचार संहिता लागू है, इसलिए सिर्फ आप रुटीन भुगतान कर सकते हैं. दिसंबर महीने का जो पैसा बकाया है या जो रूटीन में जाना है, उसे नहीं रोका जाएगा. लेकिन, जनवरी का पैसा समय से पहले ‘एडवांस’ में देना वोटरों को लुभाने जैसा माना जाएगा. इसलिए आयोग ने इस ‘गिफ्ट पॉलिटिक्स’ पर रोक लगा दी.
बिहार में क्यों नहीं लगी थी रोक?
अब सवाल उठता है कि बिहार में चुनाव के दौरान पैसा क्यों नहीं रुका? वहां स्थिति अलग थी. बिहार में सरकार ने जो पैसा डाला था, वह किसी आने वाले महीने का ‘एडवांस’ नहीं था. बिहार में महिलाओं को दिया जा रहा पैसा लगातार चल रही स्कीम का हिस्सा था. एक-एक पैसा तय तारीख पर ही डाला गया था. एडवांस भुगतान नहीं किया गया. चुनाव आयोग के नियम कहते हैं कि अगर कोई योजना चुनाव की घोषणा से पहले से चल रही है और लाभार्थियों की लिस्ट पहले से तैयार है, तो उसे रोका नहीं जा सकता. बिहार सरकार ने उस वक्त कोई ‘बोनस’ या ‘एडवांस’ नहीं दिया था, बल्कि नियमित मासिक किश्त जारी की थी, जिसे आयोग ने मतदाता का अधिकार माना.
क्या है दोनों में असली अंतर?
आसान भाषा में समझें तो महाराष्ट्र सरकार नियम से ‘आगे’ जा रही थी, जबकि बिहार सरकार नियम के ‘साथ’ चल रही थी. महाराष्ट्र में सरकार जनवरी का पैसा दिसंबर या जनवरी की शुरुआत में देकर एक ‘फील गुड फैक्टर’ बनाना चाहती थी, जो आचार संहिता का उल्लंघन है. आयोग का तर्क है कि आप सरकारी खजाने से ‘एडवांस’ पैसा देकर चुनाव को प्रभावित नहीं कर सकते. वहीं, बिहार में सरकार ने केवल अपनी नियमित प्रक्रिया का पालन किया था. वहां विपक्ष इसलिए हमलावर था क्योंकि चुनाव के दिन पैसे गिरने से वोटिंग प्रभावित हो सकती थी, लेकिन तकनीकी रूप से वह ‘नियमित भुगतान’ था, इसलिए आयोग ने हस्तक्षेप नहीं किया.सरकार को झटका, विपक्ष को मिला मुद्दा
महाराष्ट्र चुनाव आयोग के इस आदेश के मुताबिक, अब सरकार न तो कोई नया लाभार्थी जोड़ सकती है और न ही जनवरी का पैसा एडवांस में दे सकती है. फडणवीस सरकार के लिए यह बड़ा झटका है क्योंकि बीएमसी चुनाव से ठीक पहले ‘लाडकी बहीण’ का पैसा महिलाओं के खातों में पहुंचना उनके लिए गेमचेंजर साबित हो सकता था. वहीं, विपक्ष इसे अब “दोहरे मापदंड” का नाम देकर सियासी रोटियां सेंक रहा है, लेकिन संवैधानिक नियमों के तहत ‘एडवांस पेमेंट’ और ‘रेगुलर पेमेंट’ के बीच की यह लकीर ही इस फैसले का आधार बनी है.
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Delhi,Delhi,Delhi
First Published :
January 12, 2026, 21:28 IST

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