म्यांमार के रास्ते घुसेंगे भारतीय टैंक, रौंद देंगे चीन-बांग्लादेश की साजिश

20 hours ago

Last Updated:April 03, 2025, 18:19 IST

KALADAN PROJECT: चीन की नजर अरुणाचल प्रदेश पर हमेशा से टेढ़ी रही है. उसे इस बात का एहसास है कि सिलिगुड़ी कॉरिडो भारत की एक कमजोर कड़ी है. चीन तो म्यांमार में बन रहे कालादान प्रोजेक्ट के खिलाफ था. उसे लगता था क...और पढ़ें

म्यांमार के रास्ते घुसेंगे भारतीय टैंक, रौंद देंगे चीन-बांग्लादेश की साजिश

कालादान प्रोजेक्ट है भारत सरकार का मास्टर स्ट्रोक

हाइलाइट्स

भारत-म्यांमार कालादान प्रोजेक्ट सामरिक और व्यापारिक महत्व का है.कालादान प्रोजेक्ट से भारतीय सेना के टैंक आसानी से गुजर सकेंगे.सित्तवे पोर्ट का नियंत्रण भारत के पास है.

KALADAN PROJECT: भारत और म्यांमार के बीच रिश्ते चाहे वो राजनैतिक हो या सामरिक हमेशा से ठीक रहे है. चीन भारत के हर पड़ोसी देश को पैसे के बल पर खरीद लेता है. भारत को घेरने के लिए उसने बांग्लादेश पर भी अपना जाल फैंक दिया. म्यांमार में भी खूब इंवेस्ट किया. म्यांमार में भी पाकिस्तान की तर्ज पर इकॉनोमिक कॉरेडोर बना रहा है. भारत को इस बात अंदेशा है कि कि चिकन नेक को लेकर भविष्य में चुनौती खड़ी करने की कोशिश हो सकती है. लेहाजा भारत ने समंदर के रास्ते भी पूर्वोरत्तर के राज्य से जोड़ना शुरू कर दिया था. उसके लिए तैयार किया गया कालादान प्रोजेक्ट का प्लान.

क्या है कालादान प्रोजेक्ट?
भारत ने चीन को काउंटर करने के लिए अपनी कोशिशें काफी पहले ही तेज कर चुका था. जिसका सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है कालादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट. यह एक ऐसा यातायात का रूट है जो कि समंदर, नदी और जमीन के रास्ते कोलकाता से म्यांमार के सित्तवे बंदरगाह से मिजोरम को जोड़ेगा. सित्तवे पोर्ट से कालादान नदी जरिए आगे बढ़ता हुआ सड़क मार्ग तक आएगा फिर जमीन के रास्ते भारत के मिजोरम को जोड़ेगा. इस प्रोजेक्ट के पूरा हो जाने के बाद भारत के उत्तर पूर्व राज्यों से बाकी देश से जोड़ने के लिए एक और वैकल्पिक रास्ता मिल जाएगा. साल 2008 में इस परियोजना को मंजूरी दी गई थी. भारत की तरफ काम पूरा हो चुका है. म्यांमार में थोड़ा काम बाकी है.

आखिर क्यों महत्वपूर्ण है प्रोजेक्ट?
यह प्रोजेक्ट का व्यापारिक और सामरिक महत्व है. भारत के अन्य शहरों को उत्तर पूर्व के राज्यों से जोड़ने के लिए जमीन का पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी कॉरेडोर से होकर गुजरता है. 22 किलोमीटर चौड़े और 60 किलोमीटर लंबे इस कॉरेडोर पर चीन नजर काफी लंबे समय से है. भविष्य में यह रूट कभी बाधित होता है तो उत्तरपूर्व से भारत का जमीनी सम्पर्क पूरी तरह से कट जाएगा. 2017 में डोकलाम में चीन की हरकत ने उसकी मंशा को और साफ कर दिया था. उसकी नजर इस सिलीगुड़ी कॉरेडोर पर है. अब बांग्लादेश की यूनुस सरकार भी चीन को खुलेआम लालच दे चुकी है. उत्तर पूर्व तक के लिए एक वैकल्पिक रूट है कालादान प्रोजेक्ट. कुल मिलाकर 900 किलोमीटर का यह पूरा प्रोजेक्ट म्यांमार से होता हुआ भारत के उत्तर पूर्व के राज्यों को भारत के बाकी राज्यों को जोड़ेगा. इसके तहत कोलकाता से सित्तवे पोर्ट तक की 539 किलोमीटर की दूरी समंदर के जरिए तय की जाएगी. उसे बाद सित्तवे से म्यांमार के पलेतवा पर कालादान नदी के जरिए 158 किलोमीटर की दूरी तय होगी. उसके बाद 129 किलोमीटर सड़क मार्ग से होते हुए यह प्रोजेक्ट भारत के मिजोरम में जोरनपुई तक पहुंचेगा. जोरनपुई से भारत में 88 किलोमीटर की सड़क लॉंगतलई पर खत्म होगी.

टैंक गुजरेंगे आसानी से
कालादान प्रोजेक्ट के जरिए भारत अपनी सामरिक महत्व को भी बढ़ा रहा है उसका उदाहरण इस बास से साफ लगाया जा सकता है कि इस रूट पर बन रहे सभी ब्रिज क्लास 70 के बनाए गए हैं. इस रूट पर छोटे बड़े कुल 33 ब्रिज है. जिनमें से 8 भारत में और 25 म्यांमार में. यह सभी ब्रिज खास तौर पर भारतीय सेना के टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां और अन्य भारी साजों सामान का वजन उठा सके. क्लास 70 से मतलब है कि 70 टन वजनी कोई भी सैन्य उपकरण आसानी से पहुंचाए जा सकते है. इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद चिकन नेक पार कर के जमीन के रास्ते मिजोरम तक पहुंचने के लिए 1000 किलोमीटर की दूरी कम हो जाएगी.

सित्तवे पोर्ट का नियंत्रण भारत के पास
म्यांमार के रखाइंन प्रांत में कालादान नदी के डेल्टा में सित्तेव पोर्ट स्थित है. इस पोर्ट को भारत ने म्यांमार के साथ मिलकर विकसित किया. साल 2023 में भारत सरकार के पोर्ट शिपिंग और वॉटरवेज मिनिस्टर सर्बानन्द सोनेवाल ने इसका उद्धाटन किया था. पिछले साल ही 6 अप्रैल को इंडिया पोर्टस् ग्लोबल लिमिटेड ने इस पोर्ट के ऑपरेशन का पूरा अधिकार ले लिया.

चीन की आंखो में चुभता कालादान प्रोजेक्ट
चीन सित्तवे पोर्ट से 120 किलोमीटर दूर म्यांमार में बंदरगाह को भी डेवलप कर रहा है. साल 2020 में चीनी राष्ट्रपति शी जिंपिग के म्यांमार का दौरे ने BRI प्रोजेक्ट के लिए म्यांमार के साथ रिश्तों को बढ़ाया. चीन ने 2013 में अपने BRI प्रोजेक्ट के से पहले ही म्यांमार को अपने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ जोड़ना शुरू कर चुका था. साल 2010 से ही चीन म्यांमार सीमा के पास कई इकॉनोमक जोन को डेवलपमेंट के काम को शुरू कर चुका था. चीन को डर था कि भारत के साथ म्यांमार का आर्थिक और सामरिक सहयोग उनके लिए नुक्सानदायक होगा. लेहाजा चीन भारत म्यांमार बार्डर पर एक्टिव भी इंसर्जेट ग्रुप को पैसा, हथियार और स्पेशल ट्रेनिंग से मदद भी करता रहा है. म्यांमार के रखाइंन स्टेट में बने सितवे पोर्ट अराकान आर्मी की जद में है. इस प्रोजेक्ट के काम को बाधित करने के लिए कई बडे हमले भी करवाए गए.

First Published :

April 03, 2025, 18:19 IST

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