Last Updated:April 03, 2025, 17:16 IST
वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान विपक्षी दलों ने एक बार फिर मीम और भीम को एकजुट करने के लिए अलग-अलग तरीके से दलीलें दीं. विपक्ष की इस कोशिश का मकसद बिल को रोकने की बजाय अल्पसंख्यकों और दलित वोटरों को जो...और पढ़ें

वक्फ बोर्ड बिल पर चर्चा के बीच विपक्ष की 'मीम और भीम' की कोशिश भी चली.
वक्फ कानूनों में तब्दीली को सत्ताधारी बीजेपी जरूरी मान रही है. पार्टी नेता इसके हक में आधी रात के बाद तक दलील देते रहे. फिर अगला दिन निकला तो संसद के दूसरे सदन में भी दोनों तरफ से अपनी-अपनी दलीलें जारी रहीं. जो स्थितियां हैं उससे लग रहा है, बिल पास हो ही जाएगा. लेकिन विपक्ष इसे अल्पसंख्यकों और पिछड़ों को एकजुट करने के एक मौके के तौर पर देख रहा है. कांग्रेस ने स्टैंड लिया कि ये संविधान में धार्मिक आजादी की गारंटी देने वाले अनुच्छेद 25 के विरुद्ध है. यही नहीं, विपक्ष को यह भी अंदेशा है – “आज बीजेपी अपने एजेंडे के तहत अल्पसंख्यकों के अधिकार छीन रही है तो आगे चलकर दलितों के अधिकारों को प्रभावित करेगी. दरअसल, यह कोई नई बात नहीं है. विपक्ष बीजेपी के खिलाफ भीम और मीम को एकजुट करने की हमेशा से कोशिश करती रही है. मीम को मुस्लमानों और भीम को दलितों के प्रतीक के तौर पर माना जाता है.
पीछे मुड़कर देखा जाए तो इंदिरा युग के बाद से कांग्रेस का आधार यही मुस्लिम और दलित गठजोड़ ही रहा है. यह गठजोड़ जब-जब टूटा, कांग्रेस कमजोर हुई है. गैर-कांग्रेसी बीजेपी विरोधी दल भी इन दोनों को एकजुट करने की कोशिश में हमेशा से लगे रहते हैं. चाहे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी की बात की जाए या फिर बिहार में आरजेडी की. दोनों के लिए दलित-पिछड़ा हमेशा से बहुत दुलारा वोट बैंक रहा है. यहां तक कि नीतीश कुमार भले ही सत्ता बीजेपी के साथ चला रहे हैं, लेकिन उनकी नजरें मुसलमान वोटों से कभी नहीं हटतीं. इस संशोधन पर बहस के दौरान भी उनके नेताओं ने इसका पूरा खयाल रखा.
दक्षिण भारत की भी बात की जाए तो वहां की सेक्यूलर मानी जाने वाली पार्टियां किसी भी तरह दलितों के साथ मुसलमानों को एकजुट रखने का कोई मौका नहीं चूकतीं. अभी महाराष्ट्र के चुनाव में तो बाकायदा मीम और भीम प्रतीकों के साथ इस पर खूब बयानबाजी भी हुई थी. वैसे भी इंदिरा युग के बाद से हर चुनाव ध्रुवीकरण की कोशिश के साथ ही लड़ा गया है. हाल के दशकों की बात की जाए तो अभी हाफिजे में ही होगा कि कैसे मंडल-कमंडल के नारे लगे थे. उस दौर में भी मंदिर विरोधी या कहा जा सकता है कि बीजेपी विरोधी नेताओं की ओर से यह सुनिश्चित किया गया कि मुस्लिम उनके साथ रहें और मुस्लिम वोटरों ने एकजुट होकर बीजेपी से लड़ने के लिए उस वक्त बीजेपी के विरोध में कांग्रेस को छोड़कर जनता दल को वोट दिया भी था.
बाद के बदले हालात में मुस्लिम वोटरों की रणनीति बदल गई और उसका नतीजा वर्तमान के साथ अतीत में भी देखने को मिला. लगता है विपक्षी दलों ने इन्हीं अनुभवों के आधार पर इस बार भी कोशिश की है कि दलित और पिछड़ों को इस कम प्रचलित जुमले मीम और भीम से जोड़ने की कोशिशें की हैं. वैसे इसका फौरी तौर पर कोई असर होता तो नहीं दिख रहा है, लेकिन राजनीति में हमेशा आज कही हुई किसी बात का असर थोड़े वक्त बाद होता भी देखा गया है.
Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
April 03, 2025, 17:16 IST