DNA: कौन हैं नील कात्याल? टैरिफ की मनमानी पर ट्रंप को हराया, कोर्ट में निकाल दी हेकड़ी!

11 hours ago

US Tariff:  भारतीय DNA वाले एक इंसान ने टैरिफ वाले ट्रंप को हरा दिया. आज आपको ये जरूर जानना चाहिए कि जिस ट्रंप से भारत समेत पूरी दुनिया परेशान है, उन्हें उन्हीं के देश में हराने वाला व्यक्ति कौन है? ऐसा क्या हुआ कि बाइडेन को हराने वाले ट्रंप भारतीय मूल के एक इंसान से कैसे हार गए. सबसे पहले आप खबर समझिए. अमेरिका की अदालत में टैरिफ को लेकर ट्रंप के खिलाफ एक याचिका डाली गई. अमेरिकी अदालत ने सुनवाई के दौरान साफ कर दिया कि टैरिफ लगाने का अधिकार ट्रंप को नहीं है. सबसे खास बात ये है कि ट्रंप को टैरिफ पर अदालत से जो झटका लगा है, उसमें एक भारतीय मूल के व्यक्ति की खास भूमिका रही है.

'कोर्ट में कर दिया चित'

भारतीय मूल के वकील नील कत्याल की दलीलों के आगे ट्रंप प्रशासन की दलीलें खोखली साबित हुईं. नील कत्याल ने अदालत में साबित कर दिया कि ट्रंप को टैरिफ लगाने का कोई अधिकार नहीं है और उन्होंने मनमाने ढंग से ये टैरिफ लगाया है.

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यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट ने 7-4 के बहुमत से दिए फैसले में ट्रंप के टैरिफ को अमेरिकी कानून के खिलाफ बता दिया है. जब ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ लगाना शुरू किया तो उसने 1977 के एक कानून, इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट यानी IEEPA का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि व्यापार घाटे की वजह से देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति बन गई है. इसी को आधार बनाकर विदेशी आयात पर टैरिफ लगाया गया था. लेकिन कोर्ट ने अपने फैसले में ट्रंप की इस दलील को खारिज कर दिया. 

कोर्ट ने कहा कि टैरिफ लगाने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है और IEEPA का इस्तेमाल टैरिफ लगाने के लिए नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने टैरिफ को अमेरिकी कानून के ख़िलाफ़ और अमान्य बताया.  वैसे अपील कोर्ट ने जो फैसला दिया है, उसकी एक खास बात ये है कि अदालत में ट्रंप के फैसले के खिलाफ दलील पेश करने वाले मुख्य वकील भारतीय मूल के हैं. नील कात्याल ने अपने तर्कों से टैरिफ के मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन को चित कर दिया. 

55 साल के नील कात्याल अमेरिका के प्रतिष्ठित वकील और कानूनी विद्वान हैं. उनके पिता, सुरेंदर कात्याल इंजीनियर थे और उनकी मां प्रतिभा कात्याल डॉक्टर थीं. नील कात्याल का कानूनी करियर काफी अच्छा रहा है. ओबामा प्रशासन के दौरान कात्याल अमेरिका के कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल के पद पर काम कर चुके हैं, जो अमेरिकी सरकार का एक वरिष्ठ कानूनी पद होता है. कात्याल को ट्रंप विरोधी माना जाता है. हालांकि उनके लॉ फर्म मिलबैंक LLP ने अप्रैल 2025 में कानूनी सेवा देने के बदले ट्रंप प्रशासन के साथ 100 मिलियन डॉलर का समझौता किया था जिसको लेकर लोगों ने सवाल भी उठाए. लेकिन इसके बावजूद टैरिफ के मामले में नील कात्याल ने ट्रंप प्रशासन के ख़िलाफ़ केस लड़ने का फैसला किया.

कात्याल ने कोर्ट में ये दलील दी कि राष्ट्रपति को एकतरफा आर्थिक नीतियां तय करने का अधिकार नहीं है और ये अधिकार केवल जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों यानी संसद के पास है. अदालत ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए अपना फैसला सुनाया. अब जिस कोर्ट ने ये फैसला सुनाया है उसके बारे में भी आपको जानकारी देते हैं.

अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में स्थित यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट एक संघीय अपीलीय अदालत है. इसके अधिकार क्षेत्र में पूरा अमेरिका आता है. इस कोर्ट की स्थापना 1 अक्टूबर 1982 को फेडरल कोर्ट्स इंप्रूवमेंट एक्ट के तहत हुई थी. ये कोर्ट पेटेंट लॉ, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सरकारी कॉन्ट्रैक्ट जैसे मामले सुनता है. इसके फैसले को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. 
हालांकि, अमेरिकी कोर्ट का ये फैसला तुरंत लागू नहीं होगा. कोर्ट ने टैरिफ पर रोक के लिए 14 अक्टूबर तक का समय दिया है ताकि ट्रंप प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर अपील करने का समय मिल सके. ट्रंप अक्सर अपने खिलाफ़ कोई फैसला होने पर भड़क जाते हैं और इस मामले में भी वहीं हुआ. फैसला आते ही ट्रंप ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराज़गी जताई. 

ट्रंप ने कहा- 'सभी टैरिफ अभी भी लागू हैं! आज एक बेहद पक्षपातपूर्ण अपील अदालत ने गलत तरीके से कहा कि हमारे टैरिफ हटा दिए जाने चाहिए लेकिन उन्हें पता है कि अंत में जीत अमेरिका की ही होगी. अगर ये टैरिफ कभी हट गए तो देश के लिए ये पूरी तरह से विनाशकारी होगा. इससे हम आर्थिक रूप से कमज़ोर हो जाएंगे जबकि हमें मज़बूत रहना है.

अब ये समझना भी ज़रूरी है कि टैरिफ पर अमेरिकी अदालत के इस फैसले का क्या असर होगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अगर टैरिफ पूरी तरह रद्द हो जाते हैं तो अमेरिकी सरकार को अरबों डॉलर का घाटा झेलना पड़ सकता है. जिन देशों से अमेरिका ने टैरिफ वसूले हैं, उन्हें अरबों डॉलर वापस करना पड़ सकता है. 

20 अगस्त तक के आंकड़े के मुताबिक़ अमेरिकी ट्रेज़री ने लगभग 134 अरब डॉलर का टैरिफ मौजूदा वित्त वर्ष में जमा किया है जबकि पिछले साल इसी अवधि के दौरान 57 अरब डॉलर जमा हुए थे. यानी  पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 77 अरब डॉलर ज़्यादा टैरिफ के रूप में वसूले गए है. अब अपील कोर्ट के फैसले को अगर बरकरार रखा जाता है तो ट्रंप को ये टैरिफ वापस करना पड़ सकता है. 

वैसे ट्रंप ने दावा किया था कि टैरिफ लगाने से हर रोज 2 अरब डॉलर सरकार को मिलेंगे यानी 730 अरब डॉलर सालाना. लेकिन अप्रैल के महीने में टैरिफ से अमेरिकी सरकार की आमदनी रोज़ाना 300 मिलियन डॉलर से भी कम थी. यानी इस तरह पूरे साल में अमेरिका को 100 से 150 अरब डॉलर ही मिल पाता न कि 730 अरब डॉलर. ट्रंप ने टैरिफ के पैसे का इस्तेमाल 37 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज़ चुकाने के लिए करने का वादा किया था. लेकिन अदालत के फैसले से ट्रंप की योजनाओं पर पानी फिर गया है. 

जानकारों का ये भी कहना है कि अपील कोर्ट के फैसले से ट्रंप की आगे टैरिफ लगाने की क्षमता कमजोर हो सकती है. इससे विदेशी सरकारें अमेरिकी दबाव के खिलाफ ज्यादा सख्ती से खड़ी हो सकती हैं, उसका सामना कर सकती हैं या पुराने समझौतों पर फिर से विचार करने की मांग कर सकती हैं.

अमेरिका के अपील कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है वो छोटे व्यवसायों और अमेरिकी राज्यों के गठबंधनों की ओर से दायर 2 मुक़दमों के जवाब में आया है. ये मुक़दमे अप्रैल में ट्रंप के एग्ज़ीक्यूटिव आदेशों के बाद दायर किए गए थे. इन आदेशों के ज़रिए लगभग हर देश पर 10% का बेसलाइन टैरिफ और दर्जनों देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया गया था.

इससे पहले मई में न्यूयॉर्क स्थित इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट ने भी ट्रंप के टैरिफ को अवैध घोषित किया था, लेकिन अपील की प्रक्रिया की वजह से फैसला रोक दिया गया था. इस तरह ट्रंप को अपने टैरिफ के मुद्दे पर एक नहीं बल्कि 2-2 बार अदालत से मुंह की खानी पड़ी है. अगर ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट में राहत नहीं मिलती है तो भारत पर लगाया गया 25 प्रतिशत टैरिफ ज़रूर हटा दिया जाएगा. हालांकि ये साफ नहीं है कि रूस से तेल खरीदने पर लगाया गया 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भी इस फैसले में शामिल है या नहीं. वैसे सुप्रीम कोर्ट में अपील करने पर ट्रंप के लिए राहत की बात ये हो सकती है कि 9 में से 6 जजों की नियुक्ति ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन की तरफ से की गई है. इनमें से 3 को तो ख़ुद ट्रंप ने चुना था.

मित्रो, ये जानना भी ज़रूरी है कि ट्रंप के टैरिफ का उनके अपने ही देश में ज़ोरदार विरोध हो रहा है. अब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने भारत पर लगाए गए ट्रंप के टैरिफ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है. जेक सुलिवन ने एक पॉडकास्ट में कहा वैश्विक स्तर पर अमेरिकी ब्रांड गर्त में है. भारत को ही देख लीजिए. ट्रंप ने भारत के ख़िलाफ़ एक बड़ा व्यापारिक हमला किया है. अब भारत सोच रहा है कि अमेरिका से निपटने के लिए हमें चीन के साथ बातचीत करनी होगी. 

टैरिफ को लेकर मल्टीनेशनल इन्वेस्टमेंट बैंक और फाइनेंशियल सर्विसेज़ कंपनी जेफरीज ने भी ट्रंप की पोल खोली है. जैफरीज की रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप ने अमेरिका के हित के लिए नहीं बल्कि अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की वजह से भारत पर भारी-भरकम टैरिफ लगाया है. जैफरीज़ के मुताबिक- 'भारत पर अमेरिका का 50% टैरिफ ट्रंप की व्यक्तिगत नाराज़गी का नतीजा है. भारत-पाकिस्तान संघर्ष में मध्यस्थता का श्रेय नहीं मिलने से नाराज ट्रंप ने भारत पर मनमाना टैरिफ लगाया'.

DNA मित्रों, ट्रंप का टैरिफ ख़त्म होता है या नहीं, इसके लिए आपको 14 अक्टूबर तक का इंतज़ार करना होगा. जब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई होगी. लेकिन इस फैसले ने ट्रंप की मनमानी के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में उम्मीद जगाई है. भारत के लिए तो ये फैसला और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है और इस टैरिफ की वजह से भारत के 5 लाख करोड़ से ज़्यादा के निर्यात पर असर पड़ने की आशंका है, हज़ारों लोगों के बेरोज़गार होने का ख़तरा है. यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट के फैसले से ये आस जगी है कि ट्रंप का टैरिफ ख़त्म हो सकता है. 

इस फैसले के बाद भारतीय मूल के वकील नील कात्याल, पूरी दुनिया में ट्रंप के टैरिफ टेरर के ख़िलाफ़ नायक बनकर उभरे हैं. नील कात्याल ने एक भारतीय की तर्कों वाली ताक़त से पूरी दुनिया को परिचित कराया है. वैसे सिर्फ वकालत ही नहीं बल्कि अमेरिका में ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां भारतीयों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. आज आपको अमेरिका में भारतीयों की ताकत के बारे में भी जानना चाहिए. जिसे ट्रंप ने जानबूझकर शायद नजरअंदाज कर दिया.

- 2024 के आंकड़ों के मुताबिक़ अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की संख्या लगभग 52 लाख है.

- यानी अमेरिका की कुल आबादी में भारतीय मूल के लोग लगभग डेढ़ प्रतिशत हैं.

- भारतीय-अमेरिकी मुख्य रूप से कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी, टेक्सस और इलिनॉय में रहते हैं.

- न्यूजर्सी में भारतीय आबादी प्रांत की कुल आबादी का 3.3 प्रतिशत है.

- अमेरिका में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, मेडिसिन, इंजीनियरिंग और होटल उद्योग में भारतीय-अमेरिकियों का दबदबा माना जाता है.

- भारतीय अमेरिकी सबसे धनी समुदायों में से एक हैं जिनकी औसत सालाना आय 85000 डॉलर है जो अमेरिका की औसत आय 50K डॉलर से ज़्यादा है.

- अमेरिका के कुल डॉक्टर्स में से 10% भारतीय मूल के हैं. जबकि सिलिकॉन वैली में लगभग एक-तिहाई टेक वर्कर भारतीय हैं. 

- शिक्षा के मामले में भी भारतीय समुदाय काफ़ी आगे है. भारतीय समुदाय के 77% लोगों के पास ग्रेजुएशन या उससे ज़्यादा की डिग्री है. 

- अमेरिका के 60 प्रतिशत होटल भारतीयों के हैं. 

- भारतीय-अमेरिकी आबादी सिर्फ 1.5% हैं लेकिन टैक्स में उनका योगदान 6% है.

अमेरिकी प्रशासन और कंपनियों में भारतीय समुदाय से जुड़े कई लोग ऊंचे पदों पर हैं.

कॉरपोरेट जगत की बात करें तो सुंदर पिचाई गूगल के CEO हैं.

सत्य नडेला माइक्रोसॉफ्ट के CEO हैं.

अरविंद कृष्णा IBM के CEO हैं जबकि शांतनु नारायण एडोबी के CEO हैं.

इनके अलावा भी कई भारतीय अमेरिका की बड़ी कंपनियों में ऊंचे पदों पर हैं. अमेरिकी प्रशासन की बात करें तो कमला हैरिस अमेरिका की उपराष्ट्रपति रह चुकी हैं, उनकी मां डॉक्टर श्यामला गोपालन भारतीय मूल की थीं. साथ ही वो पिछले चुनाव में ट्रंप को भी टक्कर दे चुकी हैं.

- अजय बंगा विश्व बैंक के अध्यक्ष हैं.

- डॉक्टर आशीष झा अमेरिका के बड़े डॉक्टर हैं, वो व्हाइट हाउस के कोविड-19 रिस्पॉन्स कोऑर्डिनेटर रह चुके हैं.

- डॉक्टर विवेक मूर्ति अमेरिका के सर्जन जनरल रह चुके हैं.

नील कात्याल ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ कानूनी लड़ाई जीतकर सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों को राहत पहुंचाने का काम किया है.

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