Explain: ईरान पर खतरा मंडरा रहा, लेकिन आस-पास के दूसरे मुस्लिम देश क्यों डरे हुए हैं?

2 hours ago

West Asia: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है. अमेरिका की तमाम धमकियों के बीच ईरान के साथ-साथ आठ मुस्लिम देशों में भी अमेरिकी हमले का डर महसूस किया जा रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिका और ईरान दोनों अड़े हुए हैं. ट्रंप दबाव बढ़ाते जा रहे हैं, लेकिन खामेनेई झुकने को तैयार नहीं हैं. दोनों तरफ रत्तीभर नरमी भी नहीं दिख रही है. अमेरिका समंदर में महाविनाशक जंगी बेड़ा उतार चुका है. दूसरी तरफ खलीफा की सेना समंदर में बारूद बिछा रही है.

अमेरिका के साथ कौन-कौन?

दावा है कि ईरान के ऊपर जब अमेरिका हमला करेगा तो 7 देश उसका साथ देंगे. कौन हैं वो सात देश, उनकी ताकत क्या है? ये ईरान की मुश्किलें कैसे बढ़ाने वाले हैं? अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, ट्रंप के बगल में बैठकर तेहरान को ललकार रहे हैं, उसी दौरान ईरान के चारों ओर अमेरिका के महाविनाशक बॉम्बर उड़ान भर रहे थे. एक दो नहीं चार-चार B-52 जेट ने ईरान के आसमान के पास उड़ान भरके पूरे क्षेत्र को थर्रा दिया है. B-52, हिंद महासागर में स्थिति डिएगो गार्सिया मिलिट्री बेस से उड़े तो इसे ईरान के खिलाफ ट्रंप की आक्रामकता के तौर पर देखा गया. वेस्ट एशिया कहें या मिडिल ईस्ट फर्क बस समझने का है वहां अमेरिकी नौसेना के 8 विध्वंसक पोत ईरान को सुरक्षित दूरी से घेरे हुए हैं.

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यूएसएस माइकल मर्फी, यूएसएस स्प्रुआंस, यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन जूनियर ये तीनों युद्धपोत उत्तरी अरब सागर में खड़े हैं. ये तीनों, यूएसएस अब्राहम लिंकन विमानवाहक पोत की सुरक्षा में तैनात हैं. वहीं यूएसएस डेल्बर्ट डी. ब्लैक युद्धपोत लाल सागर में खड़े हैं. यूएसएस मिट्शर और यूएसएस मैकफॉल का जंगी बेड़ा होर्मुज जलडमरूमध्य के पास तैनात है. यूएसएस बल्केली और यूएसएस रूजवेल्ट पूर्वी भूमध्यसागर में तैनात है.

इस तैनाती का उद्देश्य साफ है कि ईरान की मुश्किलें सिर्फ B-52 जैसे बॉम्बर या फिर युद्धपोत की तैनाती नहीं बढ़ा रही है, बल्कि अमेरिका के साथियों ने भी ईरान के खिलाफ चक्रव्यूह बनाना शुरू कर दिया है. जो यूरोपीय देश ट्रंप के खिलाफ दिख रहे हैं, वो भी ईरान पर हमले के समय अमेरिका का साथ देने का संकेत दे रहे हैं. अमेरिका मीडिया का दावा है कि एक-दो नहीं बल्कि 7 देशों के साथ मिलकर ट्रंप ईरान पर हमला करने वाले हैं.

कौन हैं अमेरिका के ये सहयोगी

इजरायल, पावर इंडेक्स में इसकी ग्लोबल रैंकिंग भले 15 हो लेकिन ये ईरान का सबसे बड़ा दुश्मन है. इजरायल ने पिछले साल भी ईरान पर सीधा हमला किया था. इजरायल, ईरान की एयर डिफेंस मिसाइल फैसिलिटी को भारी नुकसान पहुंचा चुका है. अमेरिका के साथ मिल इजरायल ईरान के लिए सबसे घातक बन जाएगा.

फ्रांस जिसकी पावर इंडेक्स में ग्लोबल रैकिंग 6 है. वो भी पश्चिमी एशिया में पहले से तैयार बैठा है और अमेरिका के साथ मिलकर ईरान की नौसेना और एयरफोर्स को तबाह कर सकता है. इसके अलावा अमेरिका का सबसे करीबी ब्रिटेन (ग्लोबल रैंकिंग 8) ईरान के खिलाफ अमेरिका को खुफिया और नौसैनिक सपोर्ट दे सकता है. ब्रिटेन अपना एक टाइफून जेट कतर में तैनात भी कर चुका है. इजरायल, फ्रांस, ब्रिटेन सिर्फ यही तीन देश अगर अमेरिका के साथ आ गए तो ईरान के लिए बहुत बड़ी मुसीबत हो जाएगी.

इसके अलावा इटली भी है, जो ईरान के खिलाफ अमेरिका को लॉजिस्टिक्स और एयर सपोर्ट देगा. जर्मनी भी अमेरिका का साथ देगा, जिसका पावर इंडेक्स में ग्लोबल रैंक 14 है, ये भी अमेरिका को ईरान के खिलाफ लॉजिस्टिक्स और खुफिया इनपुट दे सकता है. वहीं जॉर्डन, जो पावर इंडेक्स में तो 60वें नंबर पर है लेकिन ये ईरान के लिए बहुत बड़ी क्षेत्रीय स्तर की मुसीबत बनेगा, क्योंकि पिछले साल जब इजरायल का ईरान के साथ युद्ध हुआ था तब जॉर्डन ने ईरान की मिसाइल और ड्रोन हमलों को इंटरसेप्ट करने में मदद की थी.

सातवां देश सीरिया है जिसका पावर इंडेक्स में तो 130वां रैंक है, लेकिन ये मुस्लिम देश परसेप्शन के लिए लिहाज से ईरान के लिए घातक साबित होगा. इससे साफ है कि युद्ध की स्थिति में अमेरिका के साथ ये 7 देश ईरान के लिए स्ट्रैटेजिक आपदा साबित होंगे. इसका अंदाजा ईरान को भी है. ईरान जानता है कि ट्रंप का चरित्र और उनकी मंशा क्या है? लेकिन ईरान, ट्रंप और उनके साथियों के सामने झुकने को तैयार नहीं है. ईरान की सेना ने ट्रंप को जो जवाब दिया है, उसने मुस्लिम देशों में खौफ बढ़ गया है.

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