महाभारत में धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जिक्र भाइयों के तौर पर हुआ है. तीनों के जन्म के सूत्रधार महर्षि व्यास बने. हालांकि तीनों का तीन अलग महिलाओं से हुआ. विदुर अपने भाइयों में सबसे विद्वान, बुद्धिमान और नीतिज्ञ भी थे लेकिन उन्हें कभी क्यों राजा नहीं बनाया गया. क्या थी इसकी वजह.
महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा विचित्रवीर्य की दो रानियों के साथ किए गए नियोग से पांडु और धृतराष्ट्र पैदा हुए. इस नियोग में व्यास और एक दासी से विदुर का जन्म हुआ. इसलिए विदुर को हमेशा तीसरा भाई समझा गया. हस्तिनापुर के दरबार में उन्हें उसी तरह का मान-सम्मान भी मिला लेकिन वह कभी राजा नहीं बन सके. क्यों बुद्धिमान, नीति निर्धारक, दूरदर्शी और चिंतक होने के बाद भी विदुर को राज सिंहासन के लायक नहीं समझा गया.
हस्तिनापुर में सत्यवती और शांतनु की शादी के बाद उनके दो पुत्र हुए विचित्रवीर्य और चित्रांगद. चित्रांगद की मृत्यु पहले ही हो गई. उसके बाद विचित्रवीर्य भी जब नहीं रहे. तब कुरु वंश खतरे में पड़ा लगने लगा,क्योंकि उनके कोई वारिस नहीं था. भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प ले रखा था, लिहाजा वह पुत्र पैदा करने में कोई सहयोग नहीं दे सकते थे.
तब महर्षि व्यास को नियोग के लिए याद किया गया
ऐसे में सत्यवती ने महर्षि व्यास को नियोग के लिए याद किया, जिससे धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म हुआ. सत्यवती ने महर्षि व्यास से विधवा पुत्रवधुओं, अम्बिका और अम्बालिका के साथ नियोग प्रथा से संतान उत्पन्न करने का अनुरोध किया. नियोग प्रथा के अनुसार, यदि किसी स्त्री का पति निःसंतान मर जाता है, तो वह अपने पति के वंश को आगे बढ़ाने के लिए किसी योग्य पुरुष से संतान उत्पन्न कर सकती है.
अम्बिका और अम्बालिका डर गईं
जब महर्षि व्यास अम्बिका के कक्ष में गए, तो अम्बिका ने डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लीं, जिससे उनका पुत्र धृतराष्ट्र अंधा पैदा हुआ. जब व्यास अम्बालिका के कक्ष में गए, तो वह डर से पीली पड़ गई, जिससे उनका पुत्र पांडु कमजोर और रोगग्रस्त पैदा हुआ. सत्यवती ने अम्बिका को फिर से महर्षि व्यास के पास जाने के लिए कहा, लेकिन अम्बिका ने अपनी दासी को भेज दिया. दासी ने शांत मन से महर्षि व्यास का स्वागत किया. इससे प्रसन्न होकर, महर्षि व्यास ने उसे एक बुद्धिमान और नीतिवान पुत्र होने का आशीर्वाद दिया. विदुर का जन्म हुआ.
तीनों का लालन-पालन भाइयों की तरह हुआ
इस तरह तीनों भाई थे. तीनों का लालन-पालन भी भाइयों की तरह ही हुआ. जब सिंहासन पर बैठने की बात आई तो धृतराष्ट्र को बड़े होने के बाद भी इस लायक इसलिए नहीं समझा गया, क्योंकि वह नेत्रहीन थे. छोटे भाई पांडु सिंहासन पर बैठे. लेकिन एक शाप की वजह से उनकी भी जंगल में मृत्यु हो गई. तब अयोग्य समझे गए धृतराष्ट्र को ही राज सिंहासन पर बिठा दिया गया. हालांकि विदुर भाई थे लेकिन उन्हें राज सिंहासन के योग्य नहीं समझा गया.
क्यों राजा नहीं बनाए गए विदूर
आखिर उसकी वजह क्या थी. विदुर को हस्तिनापुर का राजा न बनाए जाने के पीछे कई कारण थे. पहला उनकी माता के दासी होने के कारण सामाजिक नियमों ने उन्हें क्षत्रिय राजा के रूप में स्वीकार नहीं किया. दूसरा वह खुद सत्ता की लालसा बहुत दूर थे.
कुरु वंश की परंपरा क्या कहती थी
वैसे कुरु वंश की परंपरा के अनुसार, सिंहासन पर बैठने का अधिकार राजा के पुत्र को ही होता था. विदुर एक दासी के पुत्र थे, इसलिए वे सिंहासन के उत्तराधिकारी नहीं थे.उन्होंने हमेशा एक मंत्री और सलाहकार की भूमिका निभाई. वे बुद्धिमान और नीतिवान थे. उन्होंने हमेशा राज्य के हित में काम किया। उन्होंने कभी राजा बनने की इच्छा नहीं दिखाई. उन्होंने पांडु के निधन के बाद सिंहासन के लिए अपना दावा भी पेश नहीं किया.
तब धृतराष्ट्र केयरटेकर राजा बने
तब धृतराष्ट्र ने जन्म से अंधे होने के बावजूद सिंहासन पर दावा पेश किया. भीष्म और अन्य वरिष्ठों ने भी धृतराष्ट्र का समर्थन किया. उस समय की सामाजिक संरचना में दासी पुत्र को राजा के रूप में स्वीकार करना मुश्किल था. इसी वजह से पांडु के निधन के बाद विदुर को राजा बनाने की बात किसी ने नहीं उठाई ही नहीं.
पांडु के निधन के बाद, धृतराष्ट्र राजगद्दी के केयरटेकर राजा बने, क्योंकि पांडु के पुत्र अभी भी बच्चे थे. राज्य का प्रबंधन करने के लिए तैयार नहीं थे. धृतराष्ट्र ने पांडु के पुत्रों की परवरिश की. राज्य का प्रबंधन किया लेकिन खुद को कभी राजा नहीं घोषित किया.
उनके स्वाभाव ने भी उन्हें रोका
ये कहा जा सकता है कि उनकी जन्मगत स्थिति और स्वभाव ने उन्हें शासक बनने से रोक दिया. पांडु के निधन के बाद, उन्होंने धृतराष्ट्र को राजा बनने में भी अपना समर्थन दिया. उन्हें उचित सलाह देते रहे. उन्हें कुरु सभा में बहुत सम्मान हासिल था वह हमेशा सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े रहते थे, भले ही इसका परिणाम कुछ भी हो.
विदूर धर्म के अवतार थे
हालांकि महाभारत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विदुर धर्म के अवतार थे. व्यास ने बताया कि विदुर यमराज के अंश थे, जो एक श्राप के कारण मानव रूप में जन्मे थे. इस दैवीय उत्पत्ति ने उन्हें असाधारण बुद्धि और नैतिकता प्रदान की, लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति उनके जन्म के कारण प्रभावित हुई.
धृतराष्ट्र उन्हें किसी राज्य का राजा बना सकते थे
महाभारत काल में वर्ण व्यवस्था और सामाजिक नियम कठोर थे. विदुर की माता एक दासी थी, जिसके कारण उन्हें शूद्र वर्ण में माना गया. भले ही उनके पिता व्यास एक महान ऋषि थे. उनके सौतेले भाई क्षत्रिय थे. उस समय राजसिंहासन पर केवल क्षत्रिय वर्ण के व्यक्ति का अधिकार माना जाता था. हालांकि धृतराष्ट्र चाहते तो उनको हस्तिनापुर से जुड़े किसी भी राज्य का राजा बना सकते थे, जैसा दुर्योधन ने कर्ण के लिए किया था.
विदूर क्या करने में विश्वास करते थे
महाभारत में ये भी बताया गया है कि विदुर ने कभी अपने भाइयों या उनके पुत्रों के खिलाफ सत्ता के लिए विद्रोह नहीं किया. उनकी निष्ठा हस्तिनापुर और धर्म के प्रति थी, न कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के प्रति. महाभारत में यह कहीं भी नहीं कहा गया कि विदुर ने राजसिंहासन की मांग की या उन्हें इसके लिए अयोग्य ठहराया गया. उनकी भूमिका हमेशा एक सलाहकार और धर्म के रक्षक की रही. येसंकेत मिलता है कि विदुर स्वयं शासन करने की बजाय शासकों को सही मार्ग दिखाने में विश्वास रखते थे.