Explainer: किन केसों पर सुप्रीम कोर्ट तुरंत करती है सुनवाई, जैसे UGC मामले में की

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13 जनवरी 2026: यूजीसी ने प्रोमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन रेगुलेशन,2026 को नोटिफाई किया.
27 – 28 जनवरी: रेगुलेशन के खिलाफ पहली मुख्य याचिकाएं एडवोकेट विनीत जिंदल और मृत्युंजय तिवारी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं.
28 जनवरी: याचिकाकर्ताओं ने ‘मेंशनिंग’ के जरिए चीफ जस्टिस के सामने मामले की गंभीरता रखी. सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत सहमति जताई. इसे अगले ही दिन के लिए लिस्ट कर दिया.
29 जनवरी 2026 : सुप्रीम कोर्ट की बेंच CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची ने मामले की सुनवाई की. इस मामले पर अगली सुनवाई तक के लिए स्टे लगा दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में असाधारण तेजी दिखाई है. याचिका दायर होने के 24 से 48 घंटों के भीतर ही कोर्ट ने इसे सुनवाई के लिए लगा दिया. सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट यूजीसी रेगुलेशन 2026 के नए नियमों पर तत्काल प्रभाव से रोक भी लगा दी. कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे ताकि छात्रों को कानूनी सुरक्षा मिलती रहे.

ये सवाल उठ सकता है कि आखिर वो कौन से केस होते हैं जिसमें तुरंत सुप्रीम कोर्ट हरकत में आती है. और ऐसे केसों पर लिस्टिंग करते हुए तुरंत सुनवाई करती है. मेशनिंग भी क्या होती है, जिसके जरिए मुख्य न्यायाधीश से स्थिति में तुरंत हस्तक्षेप करने को कहा गया.

सवाल – सुप्रीम कोर्ट ने इतनी जल्दी हस्तक्षेप क्यों किया?

- सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि अगर कोर्ट तुरंत हस्तक्षेप नहीं करता, तो इसके “खतरनाक परिणाम” हो सकते थे. कोर्ट का मानना है कि नियमों की भाषा “अस्पष्ट” है. यह समाज को विभाजित कर सकती है. कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर 19 मार्च 2026 तक जवाब मांगा है.

सवाल – किन मामलों की तुरंत सुनवाई करती है सुप्रीम कोर्ट?

- सुप्रीम कोर्ट हर मामले में तुरंत सुनवाई नहीं करती लेकिन कुछ खास श्रेणियों में अदालत अर्जेंट हियरिंग या आउट ऑफ टर्न हियरिंग करती है. जैसे हाल में UGC गाइडलाइंस वाले मामले में हुआ. ऐसा आमतौर पर इन मामलों में होता है
1. मौलिक अधिकारों पर जब सीधा असर हो – अगर मामला आर्टिकल 14, 19, 21 जैसे मौलिक अधिकारों को तुरंत और बड़े पैमाने पर प्रभावित करता हो. ये मामंला शिक्षा से वंचित होने का खतरे की ओर भी ले जाता है तो इन मामलों में गिरफ्तारी, हिरासत के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता का खतरा था. ये मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक का भी है. UGC गाइडलाइंस में लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर था, इसलिए भी तेजी से सुनवाई
2. संवेदनशीलता – कोर्ट मामलों की समय संवेदनशीलता को भी देखता है. क्योंकि इस मामले में देर करने से आने वाले समय में फैसले के निरर्थक होने आशंका रहती है. कॉलेजों में परीक्षाएं शुरू होने का समय है.
3. बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रभाव – ऐसे मामले सुप्रीम कोर्ट तुरंत देखती है, जहां असर एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे समाज या सेक्टर पर पड़े. इसमें शिक्षा नीति से लेकर पर्यावरण, हेल्थ से जुड़े मामले आते हैं
4. संघवाद या संवैधानिक संतुलन का सवाल हो – जब केंद्र-राज्य संबंध या संविधान की व्याख्या दांव पर हो. राज्य बनाम केंद्र टकराव स्थिति हो, राज्यपाल बनाम विधानसभा विवाद हो या फिर अध्यादेशों की वैधता का सवाल हो.
5. अपूरणीय क्षति की आशंका हो – अगर केस ना सुना जाए तो ऐसा नुकसान हो जाएगा जिसे बाद में सुधारा नहीं जा सके.
6. हैबियस कॉर्पस और व्यक्तिगत स्वतंत्रता – ये सुप्रीम कोर्ट की सबसे हाई-प्रायोरिटी कैटेगरी है. जिसमें अवैध हिरासत, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून से जुड़े मामले आते हों
7. चीफ जस्टिस का विवेकाधिकार –आख़िर में मास्टर ऑफ रोस्टर के होने के नाते चीफ जस्टिस तय करते हैं कि मामला कितना अर्जेंट है. किस बेंच को जाएगा. आज सुना जाएगा या नहीं. यूजीसी केस में सीजेआई ने माना कि ये एकेडमिक कैलेंडर और लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है. इसलिए इसे तुरंत लिस्टिंग देकर अगले ही दिन सुनवाई की गई.

सवाल – तुरंत सुनवाई के लिए कैसे वकील सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई को मेशनिंग करते हैं. ये प्रक्रिया क्या है?

- सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की ‘मेंशनिंग’ करना एक विशेष प्रक्रिया है, जिसे कानून की भाषा में ‘अर्जेंट लिस्टिंग’ की गुहार लगाना कहते हैं. जब किसी वकील को लगता है कि मामला इतना गंभीर है कि अगर आज या कल सुनवाई नहीं हुई तो बहुत नुकसान हो जाएगा. जैसे किसी का घर गिराया जाना या यूजीसी जैसे नीतिगत बदलाव, तब वह इस प्रक्रिया का पालन करता है.
सबसे पहले वकील को एक औपचारिक ‘मेंशनिंग मेमो’ तैयार करना होता है. इसमें स्पष्ट रूप से ये तीन बातें लिखनी होती हैं – मामले का डायरी नंबर या केस नंबर. मामले का संक्षिप्त विवरण और एक्सट्रीम अर्जेंसी, जिसमें वकील को यह साबित करना होता है कि मामला सामान्य कतार में आने तक का इंतजार क्यों नहीं कर सकता.

सवाल – क्या मेशनिंग का कोई खास समय होता है या ये किसी भी समय हो सकती है?

- सुबह 10:30 बजे सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही शुरू होते ही चीफ जस्टिस की कोर्ट में ‘मेंशनिंग’ का समय होता है. तब वकील CJI की बेंच के सामने खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं. जब उनकी बारी आती है, तो वे मौखिक रूप से बताते हैं कि मामला क्यों गंभीर है. यूजीसी मामले में वकीलों ने तर्क दिया होगा कि “नियम लागू हो चुके हैं और इससे छात्रों के संवैधानिक अधिकारों का तत्काल हनन हो रहा है.”

सवाल – इस पर सीजेआई क्या करते हैं?

- सुनवाई कब होगी, इसका पूरा फैसला चीफ जस्टिस के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है. अगर CJI संतुष्ट हैं, तो वह कह सकते हैं कि इसे कल के लिए लिस्ट कर दो. यूजीसी के इस मौजूदा मामले में, कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे प्राथमिकता पर रखने का आदेश दिया. फिर CJI के आदेश के बाद कोर्ट का स्टाफ और रजिस्ट्रार उस केस को सप्लीमेंट्री कॉज लिस्ट में शामिल करते हैं, जिससे वह अगले 24-48 घंटों में जजों की बेंच के सामने आ जाता है.

सवाल – मेशनिंग के क्या नियम होते हैं?

- सिर्फ वकील ही कर सकते हैं: आमतौर पर ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ या उनके द्वारा अधिकृत सीनियर वकील ही मेंशनिंग करते हैं. आजकल सुप्रीम कोर्ट ने एक ‘मेंशनिंग पोर्टल’ भी शुरू किया है, जहां वकीलों को पहले ऑनलाइन आवेदन देना होता है. केवल विशेष स्थितियों में ही मौखिक मेंशनिंग की अनुमति मिलती है.

सवाल – कौन होते हैं एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड?

- सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार, भारत का कोई भी वकील सुप्रीम कोर्ट में बहस तो कर सकता है, लेकिन वह किसी पक्ष की ओर से केस फाइल नहीं कर सकता. न ही कोई वकालतनामा जमा कर सकता है. यह अधिकार केवल एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड यानि AoR के पास सुरक्षित है. हर वकील AoR नहीं बन सकता. इसके लिए उस वकील को कम से कम 4 साल का वकालत का अनुभव होना चाहिए. उसे किसी मौजूदा AoR (जिसका अनुभव 10 साल से अधिक हो) के अधीन 1 साल की ट्रेनिंग लेनी अनिवार्य है. इसके बाद उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोजित एक ‘AoR परीक्षा’ पास करनी होती है, जो काफी कठिन मानी जाती है.
सुप्रीम कोर्ट में दायर होने वाली हर याचिका पर AoR के हस्ताक्षर होते हैं. वह उस केस की कानूनी शुद्धता के लिए कोर्ट के प्रति जवाबदेह होते हैं. एक AoR के लिए दिल्ली के 16 किलोमीटर के दायरे में अपना कार्यालय रखना अनिवार्य है, ताकि कोर्ट उनसे कभी भी संपर्क कर सके.

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