अररिया में 200 साल पुरानी परंपरा आज भी जिंदा, नदी पर लगता है 'दोस्ती का मेला'

1 hour ago

Last Updated:January 02, 2026, 16:33 IST

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, वर्ष 1780 से 1800 के बीच जब पहुंसरा क्षेत्र पर महारानी इंद्रावती का शासन था, तब वे अपने महल से चलकर फरियानी नदी के यामुन घाट पर स्नान और पूजा करने आती थीं. महारानी के साथ सार्वजनिक रूप से स्नान और पूजा करने के लिए पूरे इलाके की प्रजा उमड़ पड़ती थी.

अररिया में 200 साल पुरानी परंपरा आज भी जिंदा, नदी पर लगता है 'दोस्ती का मेला'

अररिया: बिहार के अररिया जिले के रानीगंज स्थित फरियानी नदी में स्नान कर दोस्ती निभाने की एक अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवित है. पौष पूर्णिमा के अवसर पर फरियानी नदी के तट पर लगने वाला यह प्रसिद्ध मेला ‘दोस्ती का मेला’ के नाम से जाना जाता है. इस नाम के पीछे एक रोचक ऐतिहासिक कथा जुड़ी हुई है.

जीवनभर दोस्ती निभाने की परंपरा
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, वर्ष 1780 से 1800 के बीच जब पहुंसरा क्षेत्र पर महारानी इंद्रावती का शासन था, तब वे अपने महल से चलकर फरियानी नदी के यामुन घाट पर स्नान और पूजा करने आती थीं. महारानी के साथ सार्वजनिक रूप से स्नान और पूजा करने के लिए पूरे इलाके की प्रजा उमड़ पड़ती थी. उसी समय से लोगों में नदी में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर स्नान करने और जीवनभर दोस्ती निभाने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी चली आ रही है.

घटती जा रही मेले की जमीन
पहले फरियानी नदी के किनारे लगने वाला यह मेला 100 से 150 एकड़ क्षेत्र में फैला होता था, जहां बड़ी संख्या में दुकानदार अपनी दुकानें लगाते थे. हालांकि, समय के साथ नदी किनारे की जमीन पर खेती शुरू हो जाने से अब मेले का दायरा सिमटकर कुछ एकड़ तक ही सीमित रह गया है. इसके बावजूद मेले की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है.

लकड़ी के सामान के लिए प्रसिद्ध है मेला
रानीगंज के इस मेले में न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि दूर-दराज से आए खरीदार भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं. यहां लकड़ी से बने सामानों की जमकर खरीदारी होती है. पलंग, चौकी, कुर्सी, अलना, टेबल, बेंच और पीढ़ी जैसे फर्नीचर यहां खास तौर पर पसंद किए जाते हैं. इस मेले का लोग सालभर इंतजार करते हैं, क्योंकि यहां लकड़ी के सामान काफी सस्ते दामों में उपलब्ध होते हैं. मेले में दुकान लगाने के लिए दूसरे जिलों से भी बड़ी संख्या में बढ़ई आते हैं. ऐतिहासिक रूप से इस मेले में दान, दहेज और उपहार के रूप में लकड़ी के सामान देने की परंपरा रही है.

मध्यम और गरीब परिवारों के लिए बड़ा सहारा
जहां संपन्न वर्ग के लोग बड़े शोरूम से फर्नीचर खरीद लेते हैं, वहीं मध्यम और गरीब परिवारों के लिए यह मेला किसी उत्सव से कम नहीं होता. शादी-ब्याह और गौना के अवसर पर बहू-बेटियों को देने के लिए लोग इसी मेले से पलंग, अलमारी, कुर्सी, टेबल के साथ-साथ सिल्ला, लोढ़ी, उखड़ी और समाठ जैसे घरेलू सामान खरीदते हैं. यहां शादी से जुड़े उपहारों का पूरा सेट 15 से 20 हजार रुपये में आसानी से मिल जाता है. मेले में सैकड़ों लोग शादी की पूरी खरीदारी करते हुए नजर आते हैं.

सस्ते दाम में मिलते हैं लकड़ी के उत्पाद
इस बार भी मेले में पलंग, चौकी, कुर्सी, अलना, टेबल, बेंच और पीढ़ी जैसे लकड़ी के सामानों की खूब बिक्री हुई. फरियानी नदी के तट पर लगने वाला यह ऐतिहासिक मेला न सिर्फ दोस्ती की परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि आम लोगों की जरूरतों को भी पूरा कर रहा है.

About the Author

Amita kishor

न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क...और पढ़ें

First Published :

January 02, 2026, 16:33 IST

homebihar

अररिया में 200 साल पुरानी परंपरा आज भी जिंदा, नदी पर लगता है 'दोस्ती का मेला'

Read Full Article at Source