घबराहट या एंग्जायटी को हम अक्सर सिर्फ विचारों और भावनाओं से जोड़कर देखते हैं। लेकिन वास्तव में यह आपके शरीर में कई बड़े बदलाव लाती है जैसे कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का बढ़ना, दिल की धड़कन तेज होना और दिमाग के 'थ्रेट डिटेक्शन सेंटर' यानी एमिग्डाला का एक्टिव होना। जब यह कभी-कभार होता है तो यह एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है,जो हमें खतरों से बचाता है। लेकिन जब महीनों या सालों तक यह स्थिति बनी रहती है तो इसे 'क्रॉनिक एंग्जायटी' (लगातार रहने वाली चिंता) कहते हैं। यह न सिर्फ रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बनाती है बल्कि लंबे समय में आपके दिमाग के काम करने के तरीके और उसकी बनावट को भी बदल सकती है।
दिमाग के इन 3 हिस्सों पर पड़ता है सबसे ज्यादा असर
रिसर्च के मुताबिक, लंबी एंग्जायटी का सबसे ज्यादा असर दिमाग के इन तीन हिस्सों पर पड़ता है।
एमिग्डाला : लगातार एंग्जायटी से दिमाग का यह हिस्सा ज्यादा एक्टिव और आकार में बड़ा हो जाता है। इसकी वजह से इंसान छोटी-छोटी बातों को भी बहुत बड़े खतरे के रूप में देखने लगता है।
हिप्पोकैम्पस : यह हिस्सा हमारी याददाश्त और सीखने की क्षमता को कंट्रोल करता है। लंबे समय तक हाई कोर्टिसोल के कारण यह सिकुड़ने लगता है। यही वजह है कि एंग्जायटी से जूझ रहे लोग अक्सर चीजें भूलने की शिकायत करते हैं।
प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स : यह हिस्सा हमारी भावनाओं को कंट्रोल करता है और सही फैसले लेने में मदद करता है। एंग्जायटी में इसकी एक्टिविटी कम हो जाती है. इसलिए जब आपको तर्क के आधार पर पता भी हो कि 'सब ठीक है' तब भी आप खुद को शांत नहीं कर पाते।
याददाश्त और फोकस का दुश्मन
क्या आप एक ही पैराग्राफ को बार-बार पढ़ते हैं? कमरे में जाकर भूल जाते हैं कि वहां क्यों आए थे? या बीच बातचीत में अपनी बात भूल जाते हैं? सीनियर कंसल्टेंट-न्यूरो एंड स्पाइन सर्जन डॉ. एल. एस. हरिश्चंद्र के मुताबिक इसके पीछे एंग्जायटी हो सकती है। लगातार घबराहट दिमाग को हमेशा &अलर्ट मोड&य में रखती है। इससे फोकस और याददाश्त बनाने के लिए जरूरी कॉग्निटिव एनर्जी कम हो जाती है। यह जरूरी नहीं कि शुरुआती मेमोरी लॉस हो बल्कि दिमाग लगातार बैकग्राउंड में खतरों को स्कैन करने में व्यस्त रहता है।
नींद की कमी और डिमेंशिया का खतरा
एंग्जायटी और नींद की कमी का एक गहरा और खतरनाक चक्र है। घबराहट के कारण नींद टूटती है और नींद पूरी न होने से दिमाग खुद की सफाई नहीं कर पाता जिससे याददाश्त और मूड पर बुरा असर पड़ता है। कई लॉन्ग-टर्म स्टडीज बताती हैं कि जो लोग लगातार क्रॉनिक स्ट्रेस या एंग्जायटी में रहते हैं उनमें कोर्टिसोल और सूजन के कारण आगे चलकर डिमेंशिया और कॉग्निटिव डिक्लाइन (सोचने-समझने की क्षमता में कमी) का खतरा काफी बढ़ जाता है।
क्या ये बदलाव ठीक हो सकते हैं? (बिल्कुल, उम्मीद बाकी है!)
सबसे राहत की बात यह है कि वयस्क होने के बावजूद हमारे दिमाग में खुद को ढालने और ठीक करने की अद्भुत क्षमता होती है जिसे 'न्यूरोप्लास्टिसिटी' कहते हैं। अगर समय रहते इसका इलाज शुरू हो जाए तो स्थिति सुधरने की पूरी उम्मीद है। कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी, लाइफस्टाइल में बदलाव, अच्छी नींद और जरूरत पड़ने पर सही दवाओं की मदद से एमिग्डाला को शांत किया जा सकता है और सिकुड़ चुके हिप्पोकैम्पस को भी रिकवर किया जा सकता है।

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