अदिति शुक्ला ( इंटरनेट डेस्क) । सोचिए आप उस इंसान से फिर बात कर सकें जिसे आपने हमेशा के लिए खो दिया है। उसकी वही आवाज और मुस्कुराता चेहरा अब स्क्रीन पर लौट सकता है। AI ने इस साइंस-फिक्शन को अब डराने वाली हकीकत बना दिया है। पुराने चैट्स, वॉइस नोट्स और डेटा को पढ़कर AI दिवंगत लोगों के ऐसे डिजिटल अवतार बना रहा है जो हूबहू उनकी तरह बात करते हैं। इन्हें Griefbots या Ghostbots कहा जा रहा है। लोग अपनों की यादों के लिए इनका सहारा ले रहे हैं लेकिन साइकोलॉजिस्ट्स इसे मेंटल हेल्थ के लिए एक बहुत बड़ा रेड फ्लैग मान रहे हैं।
कैसे काम करता है Griefbot
यह कोई जादू या मृत व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं है। यह सिर्फ एक बेहद स्मार्ट AI सिस्टम है। जब किसी मरे हुए इंसान की पुरानी चैट्स, वॉइस कॉल्स और वीडियो इस AI को फीड किए जाते हैं तो यह उनके बात करने का पैटर्न, पसंदीदा शब्द और लहजा कॉपी कर लेता है। इसके बाद जब आप चैटबॉक्स में आई मिस यू लिखते हैं तो जवाब बिल्कुल वैसा ही आता है जैसा शायद वो इंसान जिंदा रहते हुए देता जैसे, मैं भी तुम्हें याद करता हूं, अपना ख्याल रखना। कुछ एडवांस वर्जन तो हुबहू वही चेहरा और आवाज बनाकर वीडियो कॉल जैसा फील भी दे रहे हैं।
Deathslop का डरावना ट्रेंड
इस टेक्नोलॉजी का एक बहुत ही भद्दा रूप है Deathslop। इसका मतलब है किसी लेट फेमस हस्ती या आम इंसान का नकली फोटो, गाना या स्वर्ग का वीडियो बनाकर लाइक्स और व्यूज के लिए वायरल कर देना। बिना परिवार के कंसेंट के बनाए गए इन AI वीडियोज ने कई परिवारों को गहरा मानसिक दर्द दिया है।
लोग बन रहे हैं इसके दीवाने
यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर की एक हालिया स्टडी में 16 ऐसे लोगों को AI अवतार से बात कराई गई जिन्होंने किसी करीबी को खोया था। स्टडी में सामने आया कि लोगों को वो अवतार ज्यादा सुकून दे रहा था जो सीधे उनके लव्ड वन्स के लहजे में बात कर रहा था। अचानक मौत के सदमे, किसी अपराधबोध या सिर्फ एक बार फिर से उनकी आवाज सुनने की तड़प लोगों को इस टेक्नोलॉजी की तरफ खींच रही है।
एक्सपर्ट्स बजा रहे हैं खतरे की घंटी
शोक का अकेलापन: क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. डैन वुल्फसन चेतावनी देते हैं कि दुख से उबरने के लिए परिवार और दोस्तों के साथ रोना, गले लगना और बातें शेयर करना जरूरी होता है। अगर इंसान अपना सारा दुख एक AI बॉट को बताने लगेगा तो वह असल इंसानी रिश्तों से पूरी तरह कट जाएगा।
मौत को न एक्सेप्ट कर पाना: एक हेल्दी Grieving (शोक) प्रोसेस का मतलब यह एक्सेप्ट करना है कि वो इंसान अब वापस नहीं आएगा। लेकिन जब स्क्रीन पर बैठा बॉट रोज आपसे गुड मॉर्निंग कहेगा तो जिंदगी और मौत के बीच की लाइन धुंधली हो जाएगी। इंसान कभी इस सदमे से बाहर ही नहीं आ पाएगा।
बिना इजाजत पुनर्जन्म: क्या उस मृत व्यक्ति ने कभी यह इजाजत दी थी कि मरने के बाद उसके प्राइवेट मैसेजेस और तस्वीरों से कोई अवतार बनाया जाए? यह उनकी गरिमा और प्राइवेसी का बहुत बड़ा वॉयलेशन है।
डेटा चोरी और मैनिपुलेशन: यह AI अवतार आपके लव्ड वन्स की प्राइवेट बातें लीक कर सकता है।
शोक के समय हम आमतौर पर अपनों की यादों और मन में बसी उनकी तस्वीर के सहारे उन्हें याद करते हैं। लेकिन ग्रिफबॉट्स इस तरीके को बदल सकते हैं। इनके जरिए लोग किसी डेड व्यक्ति के एआई सिमुलेशन से बात कर सकते हैं। इससे प्राइवेसी, कंसेंट और एआई पर इमोशनल डिपेंडेंसी जैसे कई गंभीर सवाल उठते हैं।
क्रेग क्लुगमैन, डीपॉल यूनिवर्सिटी में बायोएथिक्स और हेल्थ ह्यूमैनिटीज के प्रोफेसर

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