इरम (इंटरनेट डेस्क)। जिंदगी में क्या हासिल करना है इसकी फेहरिस्त तो हम बना लेते हैं, लेकिन किसके साथ जिंदगी बितानी है यह तय करना टाल देते हैं। करियर और आजादी के बीच मोहब्बत भी चाहिए, मगर बिना जिम्मेदारियों के... इसी उलझन में रिश्ता तो बन जाता है। लेकिन उसे निभाने का फैसला पीछे छूट जाता है। दिव्य प्रकाश दुबे का उपन्यास अक्तूबर जंक्शन यही सवाल उठाता है कि सब कुछ हासिल करने के बाद भी प्यार अधूरा रह जाए तो कामयाबी के क्या कोई मायने हैं।
जब मोहब्बत को वक्त में बांध दिया
अक्तूबर जंक्शन में सुदीप यादव और चित्रा पाठक एक-दूसरे से जुड़े होने के बावजूद अपने रिश्ते को कोई नाम नहीं देते। दोनों साल में सिर्फ एक बार 10 अक्टूबर को मिलने का फैसला करते हैं और बाकी वक्त अपने करियर और सपनों पर ध्यान देते हैं। उन्हें लगता है कि इससे प्यार और एंबीशंस के बीच बैलेंस बना रहेगा। लेकिन जज्बात किसी तय दिन के मोहताज नहीं होते। किसी से लगाव हो जाए तो उसकी कमी रोज महसूस होती है। कहानी यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं रिश्ते को नाम और जिम्मेदारी से बचाने की कोशिश में हम उसे अधूरा तो नहीं छोड़ देते।
नाम से परहेज मगर कनेक्शन की चाह
आज रिश्तों में करीब आना आसान है लेकिन उन्हें नाम देना मुश्किल. दो लोग साथ वक्त बिताते हैं एक-दूसरे की आदत बन जाते हैं मगर फ्यूचर की बात आते ही पीछे हटने लगते हैं। किसी को जिम्मेदारी का डर है तो कोई अपनी आजादी खोना नहीं चाहता। लेकिन मुश्किल तब होती है जब एक शख्स उस कनेक्शन को प्यार समझने लगता है और दूसरा उसे सिर्फ आज तक लिमिटेड रखना चाहता है। हर रिश्ता शादी तक पहुंचे यह जरूरी नहीं लेकिन दोनों को यह पता होना चाहिए कि वे एक-दूसरे की जिंदगी में क्या मायने रखते हैं।
देर से समझ आती है रिश्तों की अहमियत
अक्सर यह सोचते हैं कि पहले करियर बना लें अपने सपने पूरे कर लें, फिर रिश्ते को वक्त देंगे। लेकिन इस इंतजार में हम भूल जाते हैं कि रिश्ते भी समय और अपनापन मांगते हैं। किसी को पसंद करना और उसे अपनी जिंदगी में जगह देना दोनों अलग बातें हैं। कई बार हम सामने वाले को पसंद तो करते हैं लेकिन साथ निभाने की जिम्मेदारी लेने से बचते रहते हैं।
अक्तूवर जंक्शन इसी उलझन को सामने लाता है। कि जिंदगी में आगे बढ़ने की चाह गलत नहीं है लेकिन हर बार रिश्ते को बाद के लिए टालना भी सही नहीं हो सकता है, जब तक हमें किसी के साथ की अहमियत समझ आए तब तक उसकी जिंदगी बदल चुकी हो। इसलिए जरूरी है कि हम अपने सपनों के साथ रिश्तों को भी अहमियत दें।
रिश्ते को वक्त देना भी है जरूरी
रिश्ते को खूबसूरत बनाए रखने के लिए बड़े इजहार नहीं छोटे-छोटे प्रयास जरूरी हैं। बिजी शेड्यूल में हाल पूछना साथ बैठकर चाय पीना और पार्टनर की बात ध्यान से सुनना भी करीबियां बढ़ाता है। अपनी जरूरतों और उम्मीदों पर खुलकर बात करना भी जरूरी है। करियर के साथ समय और जिम्मेदारियों को मिलकर संभालने से रिश्ते के लिए जगह बनती है। क्योंकि प्यार सिर्फ चाहने में नहीं बल्कि एक-दूसरे को अहमियत देने में भी है।
आखिरकार जिंदगी सिर्फ कामयाबियों से नहीं उन लोगों से भी खूबसूरत बनती है जिनके साथ हम उन्हें बांटते हैं। कहीं ऐसा न हो कि सब कुछ हासिल करने की चाह में हम उसी साथ को खो दें जिसके बिना ये खुशियां अधूरी हैं।

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