जापान की 'गुड़िया' ने बढ़ा दी ट्रंप की टेंशन! डील..'डॉल' और डिप्लोमेसी का DNA टेस्ट

2 hours ago

DNA Analysis: DNA मित्रों अब हम भारत और जापान के बीच डील, डॉल और डिप्लोमेसी का DNA टेस्ट करेंगे. अमेरिका के साथ टैरिफ वाले तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के दौरे पर हैं. जापान भारत का मित्र देश है. पीएम को उपहार में एक डॉल दिया गया. आज आपको ये जरूर जानना चाहिए कि इस डॉल में ऐसा क्या है जिससे यूएस प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप की टेंशन बढ़ सकती है. अपनी जापान यात्रा के बीच प्रधानमंत्री मोदी टोक्यो के डरुमा जी मंदिर पहुंचे थे. जहां मंदिर के मुख्य पुजारी ने उन्हें एक गुड़िया भेंट की. इस गुड़िया को जापानी भाषा में डरुमा डॉल कहा जाता है. मंदिर के मुख्य पुजारी ने इस डॉल से जुड़ी धार्मिक मान्यता के बारे में भी बताया, जो मुख्य तौर पर मन्नत से जुड़ी है. सबसे पहले आपको डॉल से मन्नत मांगने की परंपरा के बारे में जानना चाहिए.

इस डॉल की दोनों आंखें सफेद होती हैं. परंपरा के मुताबिक मन्नत मांगते वक्त डॉल की दाईं आंख पर रंग लगाया जाता है. जब तक मन्नत पूरी नहीं होती. तब तक डॉल को ऐसी जगह रखा जाता है. जहां से उसे रोजाना देखा जा सके और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो डॉल  की बाईं आंख पर रंग लगाया जाता है. जापान में मान्यता है कि डरुमा डॉल से मन्नत पूरी होने के बाद जीवन सुख समृद्धि से भर जाता है. डरुमा जी मंदिर के अनुयायियों की ही तरह आज भारत और जापान भी मन्नत मांग रहे हैं. ताकि दोनों देशों को ट्रंप के सख्त टैरिफ से निपटने का ठोस समाधान मिल सके. भारत पर ट्रंप कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगा चुके हैं. ऐसी ही स्थिति का सामना जापान भी कर रहा है.

जापान के अधिकतर उत्पादों पर अमेरिका ने 24 प्रतिशत टैरिफ लगाया है लेकिन जापान में बनने वाली गाड़ियों और ऑटो उपकरणों पर 25 प्रतिशत टैरिफ है. इतना ही नहीं जापान से निर्यात होने वाले STEEL और ALUMINIUM पर ट्रंप सरकार  ने 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लगा दिया है. यानी जापान से निर्यात किए जाने वाले सभी महंगे उत्पादों पर अमेरिका ने बड़ा टैरिफ लगाया है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड  ट्रंप ने जापान के साथ वही किया है. जो भारत के साथ किया था. ट्रंप चाहते थे कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे. भारत ने इस बेबुनियाद मांग को नकार दिया तो ट्रंप ने 50 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया. इसी तरह अमेरिकी सरकार चाहती थी कि जापानी कंपनियां अमेरिका में अपना निर्माण करें. हिचकते हुए जापान ने हामी तो भरी लेकिन आखिरकार ट्रंप के लिए अपने हितों की कुर्बानी नहीं दी. चौबीस घंटे पहले जापान ने ट्रंप का कैसा और कितना बड़ा झटका दिया है ये भी आपको बेहद गौर से देखना चाहिए.

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| जापान की 'डॉल' ने..ट्रंप की टेंशन बढ़ा दी! डील..'डॉल' और डिप्लेमेसी का DNA टेस्ट

ट्रंप के अंदर...क्यों है 'डॉलर वाला डर' ? @RahulSinhaTV pic.twitter.com/eiXLDE6LQN

— Zee News (@ZeeNews) August 29, 2025

ट्रंप ने जापान की कंपनियों से कहा था कि वो अमेरिका में 550 बिलियन डॉलर का निवेश करें. ये निवेश सेमीकंडक्टर, कंप्यूटर चिप और इलेक्ट्रोनिक उत्पाद के क्षेत्रों में किया जाना था. ये सभी वो उत्पाद हैं जिनके बाजार में जापान बड़ा हिस्सेदार है. ब्लैकमेलिंग से की जा रही इस ट्रेड डील के लिए जापान के आर्थिक सलाहकार को अमेरिका भी जाना था लेकिन 29 अगस्त को जापान ने ये यात्रा रद्द कर दी और संकेत दे दिया कि ट्रंप की दादागीरी के आगे जापान झुकेगा नहीं. भारत की ही तरह जापान ने भी ट्रंप के टैरिफ पर सख्त जवाब दिया है. इसी वजह से माना जा रहा है कि दक्षिण एशिया और पूर्वी एशिया में अब भारत और जापान के तौर पर एक मजबूत आर्थिक गठबंधन जन्म ले सकता है. ऐसी संभावना क्यों जताई जा रही है ये समझने के लिए आपको अमेरिका और जापान को भारतीय निर्यात की तस्वीर बेहद गौर से देखनी चाहिए. 

ट्रंप ने भारत से निर्यात होने वाले गहनों पर भारी टैरिफ लगाया है. फिलहाल भारतीय गहनों के निर्यात का तकरीबन 30 प्रतिशत अमेरिका जाता है और तकरीबन 0.75 प्रतिशत जापान जाता है. यानी अमेरिका के विकल्प के तौर पर भारत को जापान की शक्ल में एक नया बाजार मिल सकता है. इसी तरह जापानी गाड़ियों का 36 प्रतिशत निर्यात अमेरिका जाता है. जापान की गाड़ियों पर भी ट्रंप ने टैरिफ लगाया है. भारत को जापान से गाड़ियों का निर्यात सिर्फ 0.20 प्रतिशत है. यानी अगर जापान चाहे तो उसे भी अमेरिका के विकल्प के तौर पर भारतीय बाजार मिल सकता है. भारतीय बाजार का आकार भी अमेरिका से कही ज्यादा है, जापान ने अमेरिका में 550 बिलियन डॉलर के निवेश को तो टाल दिया लेकिन जापान की इशिबा सरकार ने भारत में 10 ट्रिलियन येन, यानी तकरीबन 60 हजार करोड़ के निवेश का आश्वासन दिया है. ये आश्वासन संकेत देता है कि व्यापार में ट्रंप की दबाव वाली नीतियों के खिलाफ भारत और जापान एक साथ खड़े हो सकते हैं.

इस विश्लेषण की शुरुआत हमने डरुमा डॉल से की थी. इस डरुमा डॉल का भारत से सदियों पुराना रिश्ता है. जिसकी बुनियाद हैं बौद्ध संत बोधिधर्म, बोधिधर्म और इस गुड़िया का रिश्ता समझने के लिए आपको इतिहास के कुछ पन्ने ध्यान से देखने चाहिए. संत बोधिधर्म भारत के कांचीपुरम से थे. 5वीं और छठी शताब्दी के बीच वो चीन और जापान गए थे. जहां उन्होंने बौद्ध धर्म की एक शाखा की स्थापना की थी. जापानी भाषा में बोधिधर्म को ही डरुमा जी कहा जाता है और उन्हीं के नाम पर इस गुड़िया को डरूमा डॉल कहा जाता है. मान्यताओं के मुताबिक संत बोधिधर्म एक बड़े तपस्वी थे उनका एक सूत्र जापान में आज भी लोकप्रिय है. संत बोधिधर्म जीवन में 8 के नियम का पालन करने के लिए कहते थे. यानी अगर जीवन में सात बार भी असफल हो जाओ. तब भी आठवीं बार खड़े होकर दोबारा प्रयास करना चाहिए, ऐसा करने से सफलता जरूर मिलेगी. 

डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से त्रस्त हो चुके देश भी ऐसा ही प्रयास कर रहे हैं. ताकि दुनिया के अर्थ-तंत्र से अमेरिका का दबदबा या मनमानी कम हो सके. भारत और जापान ऐसा ही प्रयास कर रहे हैं. इसी किस्म की एक और  कोशिश का एक हिस्सा है BRICS. यानी भारत, रूस और चीन समेत 11 देशों का वो गठबंधन, जिसने अमेरिकी टैरिफ का पुरजोर विरोध किया है. हम ब्रिक्स सदस्यों के प्रयासों का विश्लेषण भी करेंगे लेकिन उससे पहले आपको ब्रिक्स के देशों पर ट्रंप के टैरिफ के आंकड़े बेहद गौर से देखने चाहिए. भारत पर ट्रंप ने 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाया है. भारत की ही तरह ब्राजील भी 50 प्रतिशत टैरिफ का सामना कर रहा है. चीन पर ट्रंप 145 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान कर चुके हैं. इसी तरह ट्रंप ने रूस पर भी 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है. 

ब्रिक्स के बाकी सदस्यों की अर्थव्यवस्था का दायरा काफी सीमित है. इसी वजह से ब्रिक्स के अहम सदस्यों पर ट्रंप ने टैरिफ वाला दांव खेला है और इन कदमों के पीछे सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है ट्रंप के अंदर ब्रिक्स की दहशत, हम ऐसा क्यों कह रहे हैं ये समझने के लिए आपको पिछली ब्रिक्स समिट की महत्वपूर्ण घोषणाएं बेहद गौर से देखनी चाहिए. ब्राजील में हुई ब्रिक्स समिट में तय किया गया था कि सदस्यों की आर्थिक मदद के लिए ब्रिक्स सदस्य अपनी संस्था बनाएंगे. इसके साथ ही साथ ब्रिक्स सदस्यों ने आपसी व्यापार बढ़ाने पर सहमति जताई थी और सबसे महत्वपूर्ण घोषणा ये थी कि ब्रिक्स सदस्य अपनी ही करेंसी में व्यापार करेंगे. 

अपनी करेंसी में व्यापार करने का यही प्लान ट्रंप के लिए सिरदर्द बना हुआ है. अगर भारत, चीन और रूस जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने अपनी करेंसी में व्यापार करना शुरु किया तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की अहमियत और कद दोनों मुंह के बल गिर जाएंगे. ऐसा अनुमान क्यों लगाया जा रहा है. ये समझने के लिए आपको कुछ समीकरण ध्यान से समझने होंगे. आज अंतरराष्ट्रीय लेनदेन का तकरीबन 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा डॉलर आधारित है. अगर ब्रिक्स सदस्यों ने अपनी करेंसी में व्यापार किया तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की डिमांड कम हो जाएगी. जिससे डॉलर की वैल्यू कमजोर होगी. कुछ जानकारों का अनुमान है कि ऐसा होने से दूसरे देशों के साथ अमेरिका का व्यापारिक घाटा 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है.

सालों से तेल का अंतरराष्ट्रीय व्यापार सिर्फ डॉलर में होता आया था लेकिन वर्ष 2023 में सऊदी अरब समेत कुछ तेल का उत्पादन करने वाले देशों ने डॉलर की जगह दूसरी करेंसी में व्यापार किया. जिससे डॉलर पर इन देशों की निर्भरता कुछ हद तक कम हो गई थी. जानकारों का मानना है अगर इस पैटर्न को सोने और RARE EARTH METALS के रिजर्व का सहयोग मिला तो अगले 10 सालों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की दखल सिर्फ 50 प्रतिशत तक रह जाएगी. यानी करेंसी का एक नया WORLD ORDER खड़ा हो जाएगा. इसी वजह से डॉलर का दबदबा बनाए रखने के लिए ट्रंप ने टैरिफ को हथियार बनाया. लेकिन कुछ ही महीनों के अंदर इसका साइड इफेक्ट अमेरिकी बाजारों पर दिखने लगा है. ये असर समझने के लिए आपको कुछ आंकड़े गौर से देखने चाहिए. 

एक अमेरिकी थिंक टैंक ने अनुमान लगाया है कि टैरिफ लागू होने के बाद अमेरिका में आयात होने वाले उत्पादों की खुदरा बाजार में कीमत 2.3 से 2.7 प्रतिशत तक बढ़ गई है. जिसकी वजह से एक आम अमेरिकी परिवार पर सालाना तकरीबन 1 लाख 23 हजार रुपए का अतिरिक्त भार पड़ रहा है. एक अनुमान ये भी है कि जो उद्योग या क्षेत्र आयात पर निर्भर हैं. अगर उन्होंने अपने दाम कंट्रोल में रखने का फैसला किया तो उन्हें अपने कर्मचारियों की तंख्वाह में 5 से 7 प्रतिशत तक की कटौती करनी पड़ सकती है. ये सिर्फ शुरुआती प्रभाव हैं, अमेरिका में किए गए कुछ आर्थिक शोध ये भी संकेत दे रहे हैं कि लंबी अवधि में ट्रंप के ये टैरिफ अमेरिका को फायदा कम और नुकसान ज्यादा दे सकते हैं. अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जिस उछाल का दावा ट्रंप कर रहे हैं शायद वो कभी आएगा ही नहीं हो सकता है कि ऐसे ही अनुमानों को भारत, जापान और चीन जैसे देशों ने भी समझ लिया है. इसी वजह से वो डटकर ट्रंप के इस टैरिफ का मुकाबला करने के लिए तैयार खड़े हैं.

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