हैदराबाद में निजाम की ताकत बढ़ाने के लिए हकीम एक खास सूप तैयार करते थे, इस मांसाहारी सूप में ऐसी ऐसी चीजें पड़ा करती थीं कि सुनकर हैरान रह जाएं. यौन ताकत बढ़ती थी. नसें फड़कने लगती थीं. निजाम फिर रातभर महफिल का आनंद लेते रहते थे. इसे कहते थे दम ए कौस यानि तूफानी शक्ति का दम.
कहा जाता है, निज़ाम महबूब अली पाशा के दरबार में एक बार दम-ए-क़ौस पर महफ़िल सजी, जिसमें 15 तवायफें और रक़ासाएं थीं. निज़ाम ने तीन कटोरियां दम-ए-क़ौस पीकर पूरी रात महफ़िल जारी रखी. ब्रिटिश रेज़िडेंट की डायरी में भी इसका ज़िक्र मिलता है कि हैदराबाद दरबार में ये सूप मर्दानगी का प्रतीक था.
हर शुक्रवार सजती थी इश्किया महफिल
निज़ाम महबूब अली पाशा (1869–1911) के बारे में एक किस्सा कहा जाता है कि वो हर शुक्रवार को “खास इश्किया महफ़िल” सजवाते थे. महफ़िल की शुरुआत दम-ए-क़ौस के सेवन से होती थी, जिसे उनका निजी हकीम 3 दिन में तैयार करता था. महफिल में “बुलबुले रक्स” यानी तवायफों और दरबारी गायिकाओं की प्रतियोगिता हुआ करती थी. वैसे हैदराबाद के छठे निजाम महबूब अली पाशा हमेशा ही भोजन प्रेमियों के मन में बसते थे. वह शौकिन मिजाज शासक थे.
हैदराबाद के छठे निजाम महबूब अली पाशा, जो अपने शक्तिवर्धक सूप दम ए कौस के लिए काफी विख्यात थे. (फाइल फोटो)
वह रात भर शेर पढ़ते रहे, तवायफें वाह-वाह करती रहीं
एक और किस्सा है निज़ाम के समय के शायर ‘शौकत रज़ा’ का. एक शाम दरबार में एक ग़ज़ल पेश करते हुए उन्होंने हाज़िरजवाबी में कहा, “जनाब, अगर दम-ए-क़ौस की एक प्याली मुझे भी मिल जाए, तो तवायफें शेर सुनाकर बेहोश हो जाएं.” निज़ाम मुस्कराए. तुरंत अपने हकीम को बुलाकर उन्हें एक प्याली भिजवाई. रात भर शौकत रज़ा शेर पढ़ते रहे और तवायफें वाह-वाह करती रहीं.
जब ब्रिटिश अफसर ने इसे चखा
दम-ए-क़ौस को ब्रिटिश अफसरों ने भी चखा! ब्रिटिश रेज़िडेंट मेजर केवेंघ ने 1878 में अपनी डायरियों में लिखा, मुझको एख गाढ़ा पेय पेश किया गया, विश्वास किया जाता था कि इससे मर्दांगी बढ़ती है. मैने जब इसे चखा तो दो घंटे में ही पूरे बदन में गजब की गर्मी महसूस करने लगा. यह बात आज भी ब्रिटिश लाइब्रेरी के मेनुस्क्रि्प्ट्स कलेक्शन में दर्ज है.
दम ए कौस सूप खास तरीके से तैयार किया जाता था. इसका कच्चा माल ही तैयार करने में महीनों लग जाते थे. फिर उसे प्रोसेस करके सूप बनाया जाता था. जिसे यूनानी हकीम खास तरीके से बनाते थे. (image generated by leonardo ai)
कौन बनाता था इसे और क्या होता था इसमें
ये एक ख़ास यूनानी-हकीमी शक्तिवर्धक सूप (एक तरह का गाढ़ा स्टू) हुआ करता था. इसे हकीम अजमल खान और हकीम लुक़मान अली सरीखे यूनानी हकीम निज़ामों के लिए बनाते थे.
इस सूप का कच्चा माल महीनों की मेहनत के बाद तैयार होता था. फिर उसे 12–18 घंटे तक धीमी आंच पर उबाला जाता था. ठंडा होने पर शहद और इलायची, बादाम, गुलाब जल मिलाया जाता था.
इसमें भेड़, हिरण या नीलगाय के जननांग, अंबर, कस्तूरी, जाफरान, शिलाजीत, अखरोट, बादाम, छुहारे, शहद और गुलाब जल पड़ा होता था. साथ में दालचीनी, इलायची, जायफल, जावित्री, अर्जुन की छाल और गिलोय का अर्क. इन सबको धीमी आंच पर कई घंटों तक पकाया जाता था, ताकि हर घटक का अर्क निकलकर सूप में आ जाए.
मामूली सूप नहीं था ‘दम ए कौस’
दम-ए-क़ौस पुरुषों की कामेच्छा बहुत बढ़ाता था. रात भर के इश्किया जलसों और हरम की रतजगों के लिए मर्दों को ताक़तवर बनाए रखता था. नसों को मज़बूत करता था. वीर्य की मात्रा बढ़ाता था. हकीम लोग इसे “नसबंदी की बीमारी” और “मर्दाना कमजोरी” की दवा मानते थे.
दम-ए-क़ौस कोई मामूली सूप नहीं था. ये एक तरह की हकीमी “इश्किया दवा” और रॉयल टॉनिक थी, जिसे पीने के बाद न सिर्फ शरीर में गर्मी और ताक़त महसूस होती थी, बल्कि मन और इंद्रियों पर भी इसका गहरा असर होता था.
पीने के बाद कैसा महसूस होता था?
‘दम-ए-क़ौस’ पीने के 30 से 60 मिनट के भीतर व्यक्ति को पूरे शरीर में गर्मी और रक्त का संचार तेज़ हो जाता था. मांसपेशियां थोड़ी तनाव में आ जाती थीं, जैसे जिम करके आए हों. नसों में मज़बूती और उत्तेजना महसूस होती थी. स्फूर्ति लगने लगती थी. कामेच्छा में तेज़ी आ जाती थी. तवायफों या संगीत के साथ बैठने पर हर भाव गहरा महसूस होता था यानी भावनात्मक और इंद्रीय-संवेदनाएं उभर जाती थीं.
‘दम-ए-क़ौस’ पीने के 30 से 60 मिनट के भीतर व्यक्ति को पूरे शरीर में गर्मी और रक्त का संचार तेज़ हो जाता था. मांसपेशियां थोड़ी तनाव में आ जाती थीं, जैसे जिम करके आए हों. (news18)
पीकर इश्क की आंच सी जलने लगती थी
कुछ लोग इसे पीकर ग़ज़लें, शायरी, या दास्तानगोई में लीन हो जाते थे. कई दरबारी कहते थे कि इसे पीने के बाद मन में “खुमार” और “इश्क” दोनों जगते हैं. कई पुराने दस्तावेज़ों में इसे “पीकर इश्क की आंच सी जलती है नस-नस में” कहा गया है.
जब एक अंग्रेज अफसर ने इसे चखा तो उसे अगले दो घंटे तक अपने पूरे शरीर में गर्मी महसूस होती रही. (image generated by leonardo ai)
इसे लेकर ये कहावत भी थी, “दम-ए-क़ौस, वो सूप था जो मर्द को शेर बना दे, और दिल को आशिक़”. ये परंपरा खासतौर पर निजाम की निजी चिकित्सीय रसोई से जुड़ी हुई थी.
अब कहां तैयार होता है
दम-ए-क़ौस जैसा शक्तिवर्धक यूनानी टॉनिक आज भी “समान प्रभाव वाले फार्मूले” के रूप में कुछ सीमित जगहों पर तैयार होता है लेकिन ये अब बदले तरीके से बनाया जाता है. हैदराबाद के कुछ पुराने यूनानी हकीम (जैसे चारमीनार और मुज़म्मिल गली के दवाखाने), लखनऊ के चौक और नक्खास इलाके में कुछ यूनानी दुकानें और दिल्ली की जामा मस्जिद के पास के कुछ पारंपरिक यूनानी फार्मेसियों में ये बेचा जाता है. हालांकि अब इसे “दम-ए-क़ौस” नाम से नहीं, बल्कि माजून-ए-कोहिस्तानी, माजून-ए-सल्तनती या यकनी टॉनिक के नाम से बेचते हैं.
सोर्स
1. “Tibb-e-Unani: The Science of Greco-Arabic Medicine”, लेखक: Hakim Syed Zillur Rahman
2. “The Last Nizam: An Indian Prince in the Australian Outback” लेखक: John Zubrzycki
3. “Dastarkhwan-e-Awadh: The Cuisine of Nawabs”, लेखक: Sangeeta Bhatnagar and R.K. Saxena
4. Riwayat-e-Deccan (1903, उर्दू दस्तावेज़) निज़ाम की महफिलें और हकीमों का ज़िक्र
5. The Hyderabad Gazette (British Reports) 1870s के दस्तावेजों में दम-ए-क़ौस की दवाएं
6. Private Diaries of Maj. Kavanagh – British Library Manuscript Archive