Last Updated:August 29, 2025, 19:05 IST
Gunned Down Book Review: पृथीपाल सिंह, भारतीय हॉकी के महान डिफेंडर और तीन बार के ओलिंपिक मेडलिस्ट, विभाजन से उभरे लेकिन यूनिवर्सिटी राजनीति की भेंट चढ़ गए. 1983 में कैंपस में गोली मारकर हत्या हुई, हत्यारे कभी प...और पढ़ें

नई दिल्ली. खेलों से जुड़ी दो किताबें ऐसी शख्सियत हैं, जिनके बारे में पहली बार सुनकर लगा कि इन पर बहुत अच्छी फिल्म बन सकती है. एक दमयंती तांबे, बैडमिंटन खिलाड़ी, जिनके पति पाकिस्तान के साथ हुई 1971 की जंग का हिस्सा थे. शादी के कुछ महीनों बाद ही जंग हुई थी. वह सीमा पार गए और उसके बाद उनका कोई पता नहीं चला. दमयंती तांबे काफी बार पाकिस्तान गईं, बहुत खोजा… लेकिन कुछ पता नहीं चला.
दूसरी कहानी बेहद कॉम्प्लेक्स यानी जटिल है. यह कहानी तीन बार के ओलिंपिक मेडलिस्ट की है. एक सुपर स्टार की कहानी है. पाकिस्तान से भारत आए. भारत आकर देश के महानतम हॉकी खिलाड़ियों में से एक बने. अलग-अलग रंग के तीन ओलिंपिक मेडल जीते. उसके बाद यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स में ऐसे फंसे कि उनका कत्ल हो गया. कातिल कभी नहीं पकड़े गए. सिर्फ एक बछित्तर सिंह नाम के शख्स ने कोर्ट के सामने समर्पण किया, जिस हथियार से कत्ल हुआ था, उस तक पहुंचाया. लेकिन बाद में वो अपनी तमाम बातों से मुकर गया और सबूतों की कमी से छूट गया. यह पृथीपाल सिंह की कहानी है.
हालांकि पृथीपाल की कहानी को लेकर ऐसा भी लगता है कि अच्छा हुआ फिल्म नहीं बनी. हमारे देश में, खासतौर पर हिंदी सिनेमा में ज्यादातर बायोग्राफी बेहद बकवास बनती हैं. साथ ही, कहानी में इतने शेड्स हैं, जो शायद किसी फिल्म में समेटना आसान नहीं होगा. इन पर किताब ही लिखी जा सकती थी. हॉकी में और उस पर भी पृथीपाल सिंह पर किताब लिखनी हो तो संदीप मिश्रा से बेहतर शायद ही कोई हो सकता है. उनकी किताब Gunned Down, The Murder of an Olympic Champion में पृथीपाल सिंह की जिंदगी से सभी शेड्स हैं. किताब हाल में ही लॉन्च हुई है और एमेजॉन पर उपलब्ध है.
पहले आज की जेनरेशन के लिए समझ लेते हैं कि पृथीपाल सिंह थे कौन. 1930 में उनका जन्म ननकाना साहिब में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. विभाजन के समय परिवार भारत आया और पृथीपाल हॉकी खिलाड़ी बने. वो ऐसे डिफेंडर बने, जिनकी पेनल्टी कॉर्नर हिट से दुनिया थर्राती थी. 1960 का रजत, 1964 का स्वर्ण और 1968 का कांस्य उनके हिस्से आया. वह उस दौर के सुपर स्टार थे. टिपिकल पंजाबी… लंबे-तगड़े. स्पोर्ट्स करियर के बाद वह डीन स्टूडेंट वेलफेयर बने पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना में. यहीं पर स्टूडेंट पॉलिटिक्स में फंसे और 20 मई 1983 को दो लोगों (शायद) ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी. वो भी यूनिवर्सिटी कंपाउंड में.
इस कहानी में बहुत अलग-अलग तरह के रंग हैं. लेकिन इन्हें तीन हिस्सों में बांट सकते हैं. पहला, विभाजन की त्रासदी. एक टीनएजर किस तरह सब कुछ छोड़कर, अपना घर छोड़कर एक अनजान शहर में आता है. उस मानसिकता को किताब में बहुत खूबसूरती से बयां किया गया है. मां-पिता का दुख और युवा होते बच्चे का ये सब देखना कैसे उसे खामोश करता जाता है, वह कहानी अपने आप में पूरी किताब के लायक है.
उसके बाद दूसरा हिस्सा आता है. यहां पर खेल की कहानी है. लेकिन भारतीय हॉकी के बारे में बहुत कम जानने वाले भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि खेलों की राजनीति असल राजनीति से ज्यादा खतरनाक है. पृथीपाल का स्वैग, उनका स्टार स्टेटस, उनका ईगो सब कुछ उस दौर के साथ जुड़ता है.
आमतौर पर बायोग्राफी एकतरफा होती जाती है. इस किताब की अच्छी बात यही है कि वो बैलेंस्ड है. सोशल मीडिया के जमाने में जहां बैलेंस्ड होना लोगों की जिंदगी से दूर जाता जा रहा है, उस समय यह किताब आई है और बताती है कि अगर पृथीपाल में अच्छी बातें थीं, तो बुरी भी थीं. वह दुख भी था जो 1960 का गोल्ड चूकने के बाद सामने आता है और वह कहते हैं कि मैं एक बार फिर ननकाना हार गया. साथ में 1968 की वह जिद भी थी, जब कप्तानी के लिए वह कुछ भी करने का तैयार होते हैं. या तो कप्तानी या टीम में भी नहीं जैसी बात. 1968 का वह ओलिंपिक ही था, जिसे तमाम लोग भारतीय हॉकी के गर्त की तरफ जाने की शुरुआत के तौर पर देखते हैं. उसमें पृथीपाल सिंह का भी हाथ था.
फिर जिंदगी का तीसरा हिस्सा. सुपर स्टार खिलाड़ी से लेकर स्टूडेंट यूनियन को कंट्रोल करने की कोशिश करने वाले डीन तक. यहां भी उनकी जिद का वह हिस्सा दिखता है, जो आखिर में मौत की वजह बना. वह हिस्सा भी दिखता है, जब वो अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते दिखे और वह भी जब उनमें एक लचीलेपन की कमी दिखी, जो किसी भी विरोध को नियंत्रित करने के लिए जरूरी होती है. दिलचस्प यह है कि पृथीपाल उस उम्र को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे थे, जब विरोध का खून उबाल लिया करता है. यहां जानना जरूरी है कि खुद पृथीपाल तमाम विरोधों का हिस्सा रहे और इमरजेंसी में जेल भी गए.
पृथीपाल की जिंदगी (और मौत) के इन तीनों हिस्सों को संदीप मिश्रा ने साधा है. वह न उनके पक्ष में दिखे, न उनके खिलाफ. कहानी ज्यों की त्यों बताने के साथ बीच-बीच में अपना ओपिनियन बिना पक्षपात के रखा. हत्या के बाद जांच में जितनी गड़बड़ियों का किताब में जिक्र है, वह हमारे सिस्टम को समझाने के लिए काफी है. एक सुपर स्टार की हत्या की जांच अगर ऐसे हुई, तो आम आदमी की कैसे होती होगी. शायद जांच इसीलिए हुई कि उसका कोई नतीजा न निकले. लेकिन इस बहाने विभाजन, खेल, यूनिवर्सिटी की राजनीति और 80 के दशक में बदल रहे पंजाब की कहानी पढ़ने को मिलती है. यही इस किताब का सार और खासियत है.
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Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
August 29, 2025, 15:43 IST