'गुड गर्ल' सिंड्रोम को अलविदा: विमेंस अब नहीं पी रही हैं अपना गुस्सा

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 विमेंस अब नहीं पी रही हैं अपना गुस्सा

By: Feature Desk | Updated Date: Fri, 16 Oct 2026 17:17:08 (IST)

सदियों से महिलाओं को शांत, विनम्र और समझौता करने वाला बनने की सीख दी जाती रही है। लेकिन अब यह सोच बदल रही है और महिलाएं अपने गुस्से को दबाने के बजाय उसे खुलकर जाहिर कर रही हैं। लेख में गुस्सा दबाने के संभावित मानसिक और शारीरिक प्रभावों, महिलाओं पर घरेलू और पेशेवर जिम्मेदारियों के बोझ और फिल्मों में महिलाओं के बदलते चित्रण को समझाया गया है। साथ ही, गुस्से को पहचानने, अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने, गिल्ट से बचने और उसे सकारात्मक बदलाव की ताकत बनाने के तरीके भी बताए गए हैं।

'गुस्सा करना महिलाओं को शोभा नहीं देता'... सदियों से हमारे समाज ने महिलाओं के लिए एक 'परफेक्ट' सांचा तैयार कर रखा था। बचपन से ही लड़कियों को विनम्र, शांत और समझौता करने वाला बनने की ट्रेनिंग दी जाती रही है। लेकिन, अब यह नैरेटिव तेजी से बदल रहा है।

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अदिति शुक्ला (इंटरनेट डेस्क) । महिलाएं अब अपने हिस्से का गुस्सा चुपचाप पीने के बजाय उसे खुलकर जाहिर कर रही हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट और गैलप ग्लोबल इमोशंस के डेटा इस बड़े बदलाव पर मुहर लगाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में ब्रिटेन की हर पांच में से एक महिला ने माना कि वह अपने दिन का एक बड़ा हिस्सा गुस्से में बिताती है जबकि 2020 में यह आंकड़ा 10 में से एक था। दुनिया भर में पिछले दो दशकों से मेन्स के मुकाबले विमेंस ज्यादा दर्ज करा रही हैं कि उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में गुस्सा आता है।

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गुस्सा दबाने की भारी शारीरिक कीमत

गुस्से को हर बार मुस्कान के पीछे छिपा लेना सिर्फ मेंटली से नहीं बल्कि फिजिकली भी खोखला करता है। 'वीमेन आर मैड' पॉडकास्ट की होस्ट और साइकियाट्रिस्ट जेनिफर कॉक्स ने अपनी रिसर्च में पाया कि जो विमेंस अपना गुस्सा लगातार दबाती हैं वे गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं।

कॉक्स के मुताबिक, 'ऐसी विमेंस में माइग्रेन, पेट की क्रॉनिक बीमारियां, मांसपेशियों का दर्द और ऑटो-इम्यून डिसीज के लक्षण बेहद आम हैं।' दरअसल विमेंस के पास आज 'मेंटल लोड' बहुत ज्यादा है। ऑफिस की डेडलाइन से लेकर बच्चों की देखभाल और घर चलाने तक की जिम्मेदारी का यह अनकहा बोझ उनके भीतर एक खामोश गुस्से को जन्म देता है जो शरीर को अंदर से बीमार कर रहा है।

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'त्याग' से 'रिबेलियन' तक का सफर

90 के दशक में फिल्मों में महिलाओं को अक्सर ऐसी इमेज में दिखाया जाता था जहां वे परिवार के लिए सब कुछ सहती थीं और अपने बारे में कम सोचती थीं। लेकिन अब सिनेमा में विमेंस के गुस्से को कमजोरी नहीं बल्कि अपने हक के लिए आवाज उठाने के तरीके के रूप में दिखाया जा रहा है। इसे इन फिल्मों से समझ सकते हैं। 'थप्पड़' की खामोश बगावत: फिल्म 'थप्पड़' में तापसी पन्नू का किरदार एक थप्पड़ के बाद अपने रिश्ते पर सवाल उठाता है। उसका गुस्सा दिखाता है कि किसी भी रिश्ते में सेल्फ-रिस्पेक्ट से समझौता नहीं किया जा सकता।

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अपने गुस्से को कैसे बनाएं अपनी ताकत

गुस्सा कोई बुरी चीज नहीं है; यह एक अलार्म है जो बताता है कि आपके साथ कुछ गलत हो रहा है या आपकी सीमाएं लांघी जा रही हैं। फेमस साइकोलॉजिस्ट और बेस्टसेलिंग किताब 'द डांस ऑफ एंगर' की ऑथर डॉ. हैरियट लर्नर और साइकोलॉजिस्ट डॉ. तारा ब्रैक महिलाओं को अपने गुस्से का सही इस्तेमाल करने के लिए ये खास टिप्स देती हैं:

'RAIN' टेक्निक अपनाएं : जब गुस्सा आए तो उसे दबाएं नहीं. इसे पहचानें (Recognize), महसूस होने दें (Allow), उसकी असली वजह समझें और फिर खुद के प्रति सहानुभूति रखें (Nurture). यह फॉर्मूला आपको गुस्से में कोई भी आक्रामक कदम उठाने से रोकता है।

सीधी और क्लियर बोलें: घुमा-फिराकर ताने मारने या चुप रहकर नाराजगी जताने के बजाय साफ बोलें। जैसे, 'मुझे आपका यह मजाक बिल्कुल पसंद नहीं आया' या 'मैं अभी इस बारे में बात करने के लिए तैयार नहीं हूं, मुझे थोड़ा स्पेस चाहिए।'

गिल्ट को किनारे रखें: महिलाओं को अक्सर गुस्सा करने के बाद गिल्ट महसूस कराया जाता है। यह समझना जरूरी है कि अन्याय, असमानता या आपके अनपेड काम की कद्र न होने पर गुस्सा आना पूरी तरह से जायज है।

गुस्से को एनर्जी में बदलें: अपने गुस्से को रोने या डिप्रेस्ड होने में बर्बाद करने के बजाय इसका इस्तेमाल बदलाव लाने के लिए करें। ऑफिस में अपनी बात रखने या घर में नए नियम बनाने के लिए इस एनर्जी का यूज करें।

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