Navratri Special : गरबा सिर्फ स्टेप्स नहीं इसके पीछे छिपा है जीवन का फलसफा

51 minutes ago
 गरबा सिर्फ स्टेप्स नहीं इसके पीछे छिपा है जीवन का फलसफा

By: Aditi Shukla | Updated Date: Fri, 16 Oct 2026 19:26:50 (IST)

नवरात्रि आते ही चारों तरफ डांडिया नाइट्स और गरबा की धूम मच जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारी-भरकम केडिया और चनिया-चोली में गोल घूमकर किया जाने वाला यह डांस सिर्फ एक सेलिब्रेशन नहीं है। इसके पीछे साइंस, जीवन का फलसफा और सैकड़ों सालों का इतिहास छिपा है।

गरबा : जीवन और 'गर्भ'

सांस्कृतिक स्कॉलर नीलिमा शुक्ला-भट्ट के मुताबिक गुजरात में गरबा की परंपरा काफी पुरानी है। माना जाता है कि 'गरबा' शब्द 'गर्भ' और 'दीप' से जुड़ा है। पहले गरबा मिट्टी के छेद वाले घड़े के चारों ओर किया जाता था जिसे 'गरबो' कहा जाता है। घड़ा इंसानी शरीर का प्रतीक है और उसके अंदर जलता दीया आत्मा को दिखाता है। इसका मतलब है कि हर इंसान के अंदर ईश्वर का अंश मौजूद है। गरबा हमेशा गोल घेरे में किया जाता है। इस घेरे को जीवन के चक्र से जोड़कर देखा जाता है जिसमें जन्म, मृत्यु और फिर से जन्म लेने की बात शामिल है। जब लोग बीच में रखी मां दुर्गा की मूर्ति के चारों ओर घूमकर गरबा करते हैं तो इसका मतलब होता है कि दुनिया बदलती रहती है लेकिन मां की शक्ति हमेशा बनी रहती है।


UNESCO की ग्लोबल पहचान

दिसंबर 2023 में यूनेस्को ने गुजरात के गरबा को अपनी 'इन्टैंजिबल कल्चरल हेरिटेज ऑफ ह्यूमैनिटी' की लिस्ट में शामिल किया था। यूनेस्को के दस्तावेजों के मुताबिक गरबा सिर्फ एक स्टेज डांस नहीं है बल्कि यह जेंडर, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक भेदभाव को मिटाकर लोगों को एक साथ लाने वाली एक खूबसूरत 'कम्युनिटी प्रैक्टिस' है।

गुजरात से यूपी-बिहार और उत्तर भारत तक का सफर

- एक समय था जब गरबा सिर्फ गुजरात की 'पोल' (पारंपरिक कॉलोनियों) और मंदिरों के आंगनों तक सीमित था। 1980 और 90 के दशक में जब गुजराती समुदाय व्यापार और काम के सिलसिले में उत्तर भारत (यूपी, बिहार, दिल्ली, पंजाब) और महाराष्ट्र की तरफ माइग्रेट हुआ तो वे अपना कल्चर भी साथ ले गए।

- ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से पब्लिश हुई किताब 'म्यूजिक एंड डांस ऑफ एवरीडे साउथ एशिया' और ऑथर आकृति सिन्हा की किताब 'लेट्स नो डांसेस ऑफ इंडिया' में इस बात का जिक्र है कि कैसे गुजराती डायस्पोरा (प्रवासी समुदाय) ने इस लोक कला को अपनी सीमाओं से बाहर निकाला। इसके बाद इस कल्चरल शिफ्ट को सबसे बड़ी रफ्तार पॉप कल्चर ने दी। 1990 के दशक में फाल्गुनी पाठक के गानों और फिर 1999 में आई फिल्म 'हम दिल दे चुके सनम' ने इसे ग्लोबल बना दिया। आज उत्तर भारत में गरबा नाइट्स कम्युनिटी बॉन्डिंग का सबसे बड़ा इवेंट बन चुका है।


गरबा और डांडिया रास में है फर्क

अक्सर लोग गरबा और डांडिया को एक ही मान लेते हैं। लेकिन हाल ही में फेमस गुजराती एक्टर मल्हार ठक्कर ने एक इंटरव्यू में इसका सटीक अंतर समझाया। उन्होंने बताया कि गरबा असल में फास्ट-पेस्ड और एनर्जेटिक डांस है जो मूल रूप से बिना किसी प्रॉप के सिर्फ ताली बजाकर देवी की भक्ति में किया जाता है। वहीं 'डांडिया रास' थोड़ा स्लो और एक्सप्रेसिव है जिसे सजी हुई लकड़ियों के साथ खेला जाता है।


1 घंटे में 500 कैलोरी बर्न करने वाला वर्कआउट है गरबा

- हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की 'कैलोरीज बर्नड इन 30 मिनट्स' रिपोर्ट के मुताबिक 'फास्ट डांसिंग' या एरोबिक डांस करने पर एक 70 किलो का व्यक्ति 30 मिनट में लगभग 216 से 252 कैलोरी बर्न करता है। इस लॉजिकल कैलकुलेशन के हिसाब से 60 मिनट (1 घंटे) लगातार गरबा खेलने पर आसानी से 430 से 500+ कैलोरी बर्न होती है।

- ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के इवोल्यूशनरी साइकोलॉजिस्ट प्रोफेसर रॉबिन डनबार की 'सिंक्रोनस डांस एंड मूवमेंट' पर की गई रिसर्च साबित करती है कि जब इंसान एक ग्रुप में सिंक होकर डांस करता है तो शरीर में अकेले डांस करने के मुकाबले ज्यादा 'एंडोर्फिन' रिलीज होता है। यह सिंक्रोनाइजेशन न सिर्फ तनाव और डिप्रेशन कम करता है बल्कि 'सोशल बॉन्डिंग' और पेन टॉलरेंस को भी तुरंत बढ़ा देता है।

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