Last Updated:February 28, 2025, 17:04 IST
सिर्फ हिंदी का भय दिखा कर राजनीति गरम करना कितना ठीक है ये एक अहम सवाल है. खास तौर से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ऐसे वक्त पर ये सवाल उठा रहे हैं जब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, आरएसएस प्रमुख और उनक...और पढ़ें

क्या बात उतनी है, जितनी कही सुनी जा रही है?
हाइलाइट्स
तमिलनाडु के सीएम स्टालिन ने NEP का विरोध कियास्टालिन ने हिंदी थोपने का आरोप लगायादेश के शीर्ष पदों पर गैरहिंदी भाषी नेता हैंतमिलनाडु के सीएम एम के स्टालिन केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का पुरजोर विरोध कर रहे हैं. उनके इस विरोध में इलाकाई भाषा और तहज़ीब की हिफाजत का सवाल कितना अहम है, ये बहुत साफ नहीं दिख रहा. इससे तो कोई इनकार कर ही नहीं सकता कि देश की अपनी एक शिक्षा नीति होनी चाहिए. खास तौर से भारत जैसे विविधता वाले देश में. लेकिन स्टालिन भाषा के आधार पर जिस तरह का आंदोलन खड़ा कर रहे हैं, उसमें राजनीतिक माइलेज लेने की कोशिश अधिक दिख रही है. क्योंकि वे एक साथ कई मसलों को मिला दे रहे हैं.
पहले भी तमिलनाडु और दक्षिण के दूसरे राज्यों से हिंदी विरोध की आवाज़ें उठती रही हैं. लेकिन उन आंदोलनों में क्षेत्रीय पहचान की चिंता ज़्यादा रही है. इस बार जिस तरह से इसकी शुरुआत संसदीय सीटों के परिसीमन और फिर जनसंख्या बढ़ाओ जैसे मसलों के घालमेल के साथ हुई, दरअसल चिंता की बात वही है.
केंद्र सरकार संसदीय सीटों का परिसीमन नए सिरे से कराने की तैयारी में है. सीटों की संख्या का निर्धारण वैसे तो परिसीमन आयोग करता है, लेकिन उसका मूल आधार जनसंख्या बनती है. जनगणना रिपोर्टों की बजाय अगर हाल में स्टालिन और दूसरे नेताओं के बयान पर गौर किया जाए तो दक्षिण के प्रदेशों के कम से कम 2 मुख्यमंत्री अपने राज्यों में आबादी बढ़ाने का बयान दे चुके हैं. उनका दावा है कि आबादी कम होने की आड़ में बीजेपी उनकी सीटों की संख्या कम कर सकती है.
इस अंदेशे को खत्म करने के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया था कि दक्षिण भारत के किसी राज्य में लोकसभा की एक भी सीट कम नहीं होने दी जाएगी. फिर भी मुख्यमंत्री स्टालिन ने एक्स (पूर्व के ट्विटर) पर एक पोस्ट शेयर की. इसमें उन्होंने लिखा है कि हिंदी भाषा को थोपने की कोशिश से प्राचीन भाषाएँ मरती हैं. उन्होंने यह भी लिखा है कि हिंदी तो मुखौटा है, असली चेहरा संस्कृत का है. उन्होंने बीजेपी पर यह भी आरोप लगाया कि “दबंग” हिंदी भाषा के हमले से 25 से ज़्यादा भाषाएँ खत्म हो चुकी हैं. उन्होंने तमिल और उसकी संस्कृति को बचाए रखने के लिए एक तरह से अपील करते हुए याद दिलाया है कि द्रविड़ आंदोलन ने ही जागरूकता पैदा की और कई आंदोलन चलाए.
देश की विविधता के लिए तमिल संस्कृति और भाषा का सवाल किसी भी तरह से कमतर नहीं है. इसे बचाकर सहेज कर रखना ही होगा. लेकिन हिंदी को स्टालिन बार-बार दबंग भाषा कह रहे हैं, इसे मानने से पहले देखना होगा कि आज देश के शीर्ष पदों पर कौन लोग बैठे हैं. देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ओडिशा की हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह गुजराती हैं. यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेता मोहन भागवत मराठी भाषी हैं तो उनके नंबर 2 दत्तात्रेय होसबले कन्नड़ बोलने वाले हैं. फिर सिर्फ राष्ट्रीय शिक्षा नीति जिसमें राज्य की एक भाषा को शामिल रखना ही है, उसे शामिल करके हिंदी को सबके लिए खतरा बताना गले से नहीं उतरता है.
Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
February 28, 2025, 17:04 IST