कौन हैं वो 2 जज जिन्‍होंने 'ब्रेस्ट पर हाथ' वाले फैसले पर क‍िया करारा प्रहार

3 days ago

Last Updated:March 26, 2025, 17:36 IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज राम मनोहर मिश्रा ने 'ब्रेस्ट पर हाथ और नाड़ा तोड़ने' वाला फैसला द‍िया, तो खूब आलोचना हुई. अब सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने इसे अमानवीय बताते हुए रोक लगा दी है. हम आपको उन चार जजों क...और पढ़ें

कौन हैं वो 2 जज जिन्‍होंने 'ब्रेस्ट पर हाथ' वाले फैसले पर क‍िया करारा प्रहार

सुप्रीम कोर्ट के दो जज, जिन्‍होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अमानवीय बताया.

हाइलाइट्स

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की सुप्रीम कोर्ट ने आलोचना की.जस्टिस गवई और मसीह ने फैसले को अमानवीय बताया.जस्टिस त्रिवेदी और वराले ने फैसले में खामी नहीं देखी.

नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म की कोशिश से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसला द‍िया, जिसकी खूब आलोचना हुई. क्‍योंक‍ि जज ने फैसले में कहा था क‍ि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट पकड़ना और उसके पायजामे के नाड़े को तोड़ना रेप नहीं. कुछ द‍िनों पहले इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्‍ट‍िस प्रसन्ना भालचंद्र वराले की पीठ ने सुनने लायक नहीं माना. लेकिन कुछ ही दिन बाद यह केस जब जस्‍ट‍िस बी.आर. गवई और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के पास पहुंचा तो उन्‍होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बेहद आपत्‍त‍िजनक मानते हुए तुरंत रोक लगा दी. हम आपको उन जजों के बारे में बताने जा रहे हैं, ज‍िन्‍होंने ये फैसले द‍िए. सबसे खास बात, सभी चारों जजों का इत‍िहास मह‍िला अपराधों के ख‍िलाफ सख्‍ती से कदम उठाने का रहा है. मह‍िला सुरक्षा पर कड़े फैसलों के ल‍िए ये जाने जाते रहे हैं.

जिन्‍होंने रोक लगाई

जस्‍ट‍िस बीआर गवई
महाराष्‍ट्र के रहने वाले जस्‍ट‍िस गवई 16 साल तक बॉम्बे हाईकोर्ट में जज रहे. मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट आए. इससे पहले भी उन्‍होंने मह‍िलाओं से जुड़े कई ऐत‍िहास‍िक फैसले द‍िए हैं. फरवरी 2025 में मह‍िलाओं से जुड़े कानूनों के समीक्षा की मांग की गई तो एक झटके में गवई ने खार‍िज कर द‍िया. साफ कहा, ये कानून मह‍िलाओं की सुरक्षा के ल‍िए बनाए गए हैं. नवंबर 2024 में उन्‍होंने तेलंगाना में महिलाओं की न्यायपालिका में भागीदारी की तारीफ की थी.

जस्‍ट‍िस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
पंजाब के रोपड़ के रहने वाले जस्‍ट‍िस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने वकालत से कर‍ियर की शुरुआत की. सहायक महाधिवक्ता और अतिरिक्त महाधिवक्ता के पदों पर भी रहे. जुलाई 2008 में उन्‍हें पंजाब एवं हर‍ियाणा हाईकोर्ट का जज बनाया गया. इसके बाद राजस्‍थान हाईकोर्ट के चीफ जस्‍टि‍स भी रहे. नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को असंवेदनशील बताते हुए रोक लगा दी. इससे पहले भी उन्‍होंने मह‍िलाओं से जुड़े महत्‍वपूर्ण फैसले द‍िए हैं.

जज ज‍िन्‍हें हाईकोर्ट के फैसले में नहीं दिखी खामी

जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी
जस्टिस बेला मदन त्रिवेदी सुप्रीम कोर्ट की सीनियर जज हैं. गुजरात के पाटन में पैदा हुईं जस्‍ट‍िस त्रिवेदी के पिता भी न्‍याय‍िक सेवा में थे. इन्‍होंने भी कर‍ियर की शुरुआत वकालत से की. 1995 में अहमदाबाद के सिटी सिविल एंड सेशंस कोर्ट में जज बनीं. इसके साथ उनका नाम लिम्का बुक ऑफ इंडियन रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ, क्योंकि उनके पिता भी उसी कोर्ट में जज थे. फ‍िर गुजरात और राजस्‍थान हाइकोर्ट की भी जज रहीं. निष्‍पक्ष और कानून के मुताबिक, फैसलों के ल‍िए उन्‍हें जाना जाता है.

बिलकिस बानो केस में जब 11 दोष‍ियों की रिहाई का मामला आए तो उन्‍होंने खुद को सुनवाई से अलग कर ल‍िया था. उनकी खूब तारीफ भी हुई थी. मह‍िलाओं से बलात्कार और हत्या के मामलों में दोषियों की सजा को बरकरार रखने या बढ़ाने के पक्ष में हमेशा रही हैं. उनकी बेंच ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों में सबूतों की मजबूती और पीड़िता के सम्मान पर जोर दिया है. एससी एसटी आरक्षण में कोटा के अंदर कोटा पर ज‍िन 7 जजों की संव‍िधान पीठ ने ऐत‍िहास‍िक फैसला सुनाया था, उस पीठ में जस्‍ट‍िस बेला त्रिवेदी भी थीं. जस्टिस त्रिवेदी ने बहुमत से असहमति जताई और कहा कि राज्य विधानमंडलों को संविधान के तहत अधिसूचित जातियों को सबडिवाइड करने का अधिकार नहीं है.

जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
महाराष्‍ट्र के रहने वाले जस्‍ट‍िस प्रसन्ना भालचंद्र वराले सुप्रीम कोर्ट के सम्मानित जज हैं. अगस्त 1985 में उन्‍होंने वकील के रूप में कर‍ियर की शुरुआत की थी. सिविल एवं आपराधिक मामलों में प्रैक्टिस की. अंबेडकर लॉ कॉलेज में प्रोफेसर भी रहे. बाद में जुलाई 2008 को उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट का जज बनाया गया. अक्टूबर 2022 को कर्नाटक हाईकोर्ट के जज बने. फ‍िर जनवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट आए.

मह‍िलाओं से जुड़े मामलों में वे हमेशा सख्‍त रहे हैं. फरवरी 2025 में घरेलू हिंसा कानून का सही से पालन न होने पर उन्‍होंने राज्‍यों को फटकार लगाई थी. इसे मह‍िलाओं की सुरक्षा में बाधक बताया था. जस्‍ट‍िस वराले की पीठ ने महिलाओं के अधिकारों, विशेषकर मातृत्व और कार्यस्थल पर उनके अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं. उन्होंने ही कहा था कि “माताओं को अपने बच्चों को स्तनपान कराने का अधिकार है, और यह अधिकार कार्यस्थल पर भी सुरक्षित रहना चाहिए.

Location :

New Delhi,New Delhi,Delhi

First Published :

March 26, 2025, 17:36 IST

homeuttar-pradesh

कौन हैं वो 2 जज जिन्‍होंने 'ब्रेस्ट पर हाथ' वाले फैसले पर क‍िया करारा प्रहार

Read Full Article at Source