Last Updated:April 02, 2025, 14:02 IST
Pension vs Government : केंद्र सरकार एक बार फिर पेंशन को लेकर पशोपेश में पड़ गई. यह मामला साल 2006 से पहले और बाद में रिटायर होने वाले कर्मचारियों से जुड़ा है. इनकी पेंशन विसंगति दूर करने के लिए सरकार को करीब 2...और पढ़ें

6वें वेतन आयोग के बाद पेंशन को लेकर विसंगति पैदा हो गई थी.
हाइलाइट्स
सरकार को पेंशन विसंगति दूर करने में 25 हजार करोड़ खर्च होंगे.2006 से पहले रिटायर कर्मचारियों को कम पेंशन मिल रही है.सरकार ने वित्त अधिनियम 2025 के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की.नई दिल्ली. पेंशन का भूत सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा है. इससे पीछा छुड़ाने के लिए केंद्रीय सेवा पेंशन नियमों में भी संशोधन किया गया, जिसे वित्त अधिनियम 2025 के माध्यम से पेश किया गया है. बावजूद इसके सैकड़ों कर्मचारियों के पेंशन में आई विसंगति को खत्म करना आसान नहीं है और इसके लिए सरकार को करीब 25 हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. इतना ही नहीं, हर कर्मचारी न सिर्फ बढ़ी हुई पेंशन देना पड़ेगा, बल्कि लाखों रुपये का एरियर भी देना होगा.
दरअसल, यह पूरा मामला जुड़ा है साल 2006 से पहले और बाद में रिटायर होने वाले समान रैंक के अधिकारियों से. इन अधिकारियों के पेंशन में काफी विसंगति है. इस विसंगति को दूर करने के लिए कर्मचारियों ने 2008 में ही अदालत का रुख किया था और तब से अब तक तमाम फैसलों के बावजूद सरकार ने इस विसंगति को दूर नहीं किया. अब एक बार फिर इसकी सुनवाई 16 मई, 2025 को होनी है.
क्या है कर्मचारियों की चिंता
ऑल इंडिया S-30 पेंशनर्स एसोसिएशन और FORIPSO (फोरम ऑफ रिटायर्ड आईपीएस ऑफिसर्स) का कहना है कि 2006 से पहले रिटायर हुए कर्मचारियों को इसके बाद रिटायर हुए कर्मचारियों के मुकाबले कम पेंशन मिल रही है. इन कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों संगठनों ने 01.09.2008 को पेंशन और पेंशनभोगी कल्याण विभाग (DPPW) द्वारा जारी एक कार्यालय ज्ञापन (OM) को मुद्दा बनाया, जिसने कथित तौर पर 2006 से पहले और 2006 के बाद सेवानिवृत्त हुए पेंशनभोगियों के बीच एक अनुचित पेंशन अंतर पैदा किया था.
6वें वेतन आयोग से शुरू हुआ विवाद
साल 2006 में 6वां वेतन आयोग लागू होने के बाद कार्मिक मंत्रालय ने 2008-09 ऑफिशियल मेमोरेंडम जारी किया था, जिससे 2006 से पहले और 2006 के बाद के पेंशनभोगियों को मिलने वाली पेंशन में ‘असमानता’ आ गई. संगठनों का कहना है कि इसके बाद 2006 से पहले के कई पेंशनभोगी अब 2006 के बाद के पेंशनभोगियों से कम पेंशन प्राप्त कर रहे थे, जो S-29 या S-28 के निचले वेतनमान में थे. FORIPSO का तर्क भी समान था. इसने भी OM को चुनौती दी और यह आरोप लगाते हुए कहा कि 2006 से पहले सेवानिवृत्त हुए डीजी रैंक के आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ भेदभाव किया, उनके संशोधित पेंशन को न्यूनतम स्तर पर तय किया, चाहे सेवा में रहते हुए उन्होंने कितने भी वेतनवृद्धि प्राप्त की हों और 2006 के बाद सेवानिवृत्त हुए जूनियर बैच के डीजी रैंक अधिकारियों से कम पेंशन दी.
पहले कैट फिर अदालत ने दिया आदेश
दोनों मामले अंततः एक हो गए, लेकिन सरकार की असल समस्या FORIPSO को लेकर है. FORIPSO ने साल 2012 में इस मामले को CAT में उठाया तो 15 जनवरी 2015 को इसके पक्ष में एक निर्णय भी आया, जिसमें सरकार को पेंशन स्केल को बहाल और संशोधित करने का आदेश दिया गया. केंद्र द्वारा CAT के आदेश को लागू न करने पर FORIPSO ने 02.07.2015 को अवमानना मामला दायर किया. पिछले साल 20.03.2024 को उच्च न्यायालय ने FORIPSO के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसमें संशोधित पेंशन और बकाया का भुगतान तीन महीने के भीतर और 01.01.2006 से प्रभावी करने का आदेश दिया गया.
फिर कोर्ट पहुंचा संगठन
जब केंद्र उच्च न्यायालय के आदेश को लागू नहीं किया तो FORIPSO ने 17.05.2024 को अवमानना याचिका दायर की. केंद्र ने फिर 05.07.2024 को दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की. 4 अक्टूबर, 2024 को सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथ की खंडपीठ द्वारा इसे खारिज कर दिया गया. इसके बाद केंद्र के पास बहुत कम कानूनी उपाय बचे. अभी बकाया भुगतान नहीं होने पर केंद्र के खिलाफ दायर अवमानना याचिका अब 16 मई 2025 को सुनवाई होगी.
सरकार ने फिर खेला दांव
अब जबकि केंद्र के पास कोई विकल्प नहीं बचा तो उसने वित्त अधिनियम 2025 के जरिये इससे बचाव का रास्ता निकालने की कोशिश की. वित्त अधिनियम 2025 ने ‘केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम और सिद्धांतों की वैधता’ को शामिल किया. इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार के पास अपने पेंशनभोगियों को वर्गीकृत करने का अधिकार है. साथ ही पेंशनभोगियों के बीच अंतर बनाने या बनाए रखने के लिए भी उसके पास अधिकार हैं और पेंशन अधिकार के लिए सेवानिवृत्ति की तारीख को ही आधार माना जाएगा.
कोर्ट का आदेश बना रोड़ा
सरकार के इस बदलाव से पहले ही 2024 के दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश ने डीएस नकरा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1983) सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ‘सेवानिवृत्ति की तारीख पेंशनभोगियों के वर्गीकरण के लिए एक वैध मानदंड नहीं हो सकती’ और UoI बनाम एसपीएस वैन्स (2008) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ‘एक ही रैंक के अधिकारियों को पेंशन के भुगतान में कोई असमानता नहीं हो सकती, जो संशोधित वेतनमानों की शुरुआत से पहले सेवानिवृत्त हुए थे’.
अगर मान लिया तो कितना बोझ
एक तरफ पेंशन की इस विसंगति को दूर करने को लेकर कानूनी बहस चल रही है तो दूसरी ओर इसके वित्तीय बोझ के आकलन से ही सरकार सिहर उठती है. FORIPSO का अनुमान है कि प्रत्येक प्रभावित पेंशनभोगी को 14.5 लाख रुपये से 16.5 लाख रुपये के बीच बकाया राशि दी जानी चाहिए. 300 से अधिक सेवानिवृत्त अधिकारियों के प्रभावित होने के साथ मोटे अनुमान बताते हैं कि यदि दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश लागू किया जाता है, तो केंद्र को 25,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक के पेंशन बिल का सामना करना पड़ सकता है.
Location :
New Delhi,New Delhi,Delhi
First Published :
April 02, 2025, 14:02 IST